
यूनिक समय, मथुरा। कान्हा की नगरी मथुरा-वृंदावन में बसंत पंचमी का त्योहार केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कला, वास्तुकला और अटूट श्रद्धा का अनूठा उत्सव बन गया। इस पावन अवसर पर विश्व प्रसिद्ध शाहजी मंदिर (टेढ़े खंभों वाला मंदिर) के सुप्रसिद्ध ‘बसंती कमरे’ के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। गौरतलब है कि श्री राधा रमण बिहारी जी मंदिर के इस विशेष कक्ष के पट वर्ष में केवल दो बार—बसंत पंचमी और सावन के झूला उत्सव—पर ही खुलते हैं। इस दुर्लभ दर्शन का लाभ उठाने के लिए देश-विदेश से आए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा, जिससे पूरी कुंज गली ‘बांके बिहारी’ के जयकारों से गूंज उठी।
बसंती कमरे की बेमिसाल खूबसूरती
वृंदावन के शाहजी मंदिर का ‘बसंती कमरा’ अपनी अद्भुत साज-सज्जा के लिए दुनिया भर में मशहूर है। बसंत पंचमी के मौके पर पूरे कक्ष को बसंती आभा से सराबोर कर दिया गया। इस कमरे की छत और दीवारों पर लगे बेल्जियम के झूमर (कांच) और दुर्लभ चित्रकारी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती है। मान्यता है कि इस विशेष दिन ठाकुर जी साक्षात बसंती स्वरूप में यहां विराजमान होते हैं। जैसे ही मंदिर के कपाट खुले, वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य के दर्शन कर खुद को धन्य महसूस किया।
स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना
शाहजी मंदिर की नक्काशी और स्थापत्य कला इसे अन्य मंदिरों से बिल्कुल अलग बनाती है। इस भव्य मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी में लखनऊ के मशहूर जौहरी शाह कुंदन लाल और शाह फुंदन लाल ने करवाया था। मंदिर के मुख्य हॉल में लगे ‘टेढ़े खंभे’ पर्यटकों और भक्तों के लिए हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहे हैं, जिसके कारण इसे ‘टेढ़े खंभों वाले मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है। बसंत पंचमी के दिन इन नक्काशीदार खंभों और मेहराबों के बीच जब ठाकुर जी का दरबार सजता है, तो इसकी सुंदरता किसी राजसी महल जैसी प्रतीत होती है।
आस्था और विरासत का संगम
वृंदावन में बसंत पंचमी का यह आयोजन न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत करता है। जौहरी भाइयों द्वारा निर्मित यह मंदिर भारतीय और पाश्चात्य वास्तुकला (जैसे बेल्जियम ग्लास का उपयोग) का एक दुर्लभ मेल है। मंदिर परिसर में उमड़े भक्तों के सैलाब को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा प्रबंध किए थे। बसंत के आगमन के साथ ही ठाकुर जी की इस अनुपम झांकी ने भक्तों के हृदय में भक्ति का नया संचार कर दिया है।
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