
यूनिक समय, नई दिल्ली। संगम नगरी प्रयागराज के माघ मेले में पिछले कई दिनों से जारी हाई-वोल्टेज ड्रामे और धार्मिक-प्रशासनिक गतिरोध का अंत एक अत्यंत भावुक और विवादित मोड़ पर हुआ है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बिना संगम स्नान किए ही माघ मेले से वापस लौटने का ऐलान कर दिया है। उन्होंने अत्यंत भारी मन से इस पावन भूमि को छोड़ते हुए कहा कि यह स्थिति उनकी कल्पना से परे और न्याय व मानवता पर भरोसे को झकझोरने वाली है। प्रयागराज, जो सदैव शांति और आस्था का केंद्र रहा है, वहां से एक धर्मगुरु का इस तरह जाना प्रशासनिक और धार्मिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
प्रशासन का प्रस्ताव और शंकराचार्य की ‘ना’
शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि विवाद के बीच प्रशासन ने बीच-बचाव की कोशिश की थी। मुख्य कार्याधिकारी चंद्र प्रकाश उपाध्याय द्वारा भेजे गए पत्र में प्रस्ताव दिया गया था कि उन्हें ससम्मान पालकी से संगम ले जाया जाएगा और अधिकारियों की मौजूदगी में स्नान कराया जाएगा। हालांकि, अविमुक्तेश्वरानंद ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उनकी मुख्य मांग उस प्रशासनिक दुर्व्यवहार के लिए माफी की थी, जो उनके शिष्यों के साथ हुआ था। माफी न मिलने पर उन्होंने बिना स्नान किए ही लौटने का कड़ा निर्णय लिया।
विवाद की जड़
इस पूरे विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को हुई थी, जब संगम स्नान के लिए जा रही शंकराचार्य की पालकी को पुलिस ने रोक दिया। इसके बाद जो हुआ उसने पूरे देश का ध्यान खींचा। शिष्यों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी की और उनकी शिखा (चोटी) पकड़कर घसीटा। विवाद तब और गहरा गया जब प्रशासन ने नोटिस जारी कर उनसे ‘शंकराचार्य’ होने का प्रमाण मांग लिया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा बिना नाम लिए ‘कालनेमि’ (छल करने वाला राक्षस) शब्द के प्रयोग ने आग में घी का काम किया। जवाब में अविमुक्तेश्वरानंद ने मुख्यमंत्री की तुलना औरंगजेब से कर दी, जिससे यह मामला पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है।
प्रशासनिक ढांचा भी हुआ प्रभावित
इस विवाद की आंच उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी तक भी पहुंची। जहाँ एक तरफ बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने शंकराचार्य के समर्थन में 26 जनवरी को इस्तीफा दिया, वहीं अगले ही दिन अयोध्या के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार ने मुख्यमंत्री के सम्मान में अपनी नौकरी छोड़ दी। संतों का समाज भी इस मुद्दे पर दो धड़ों में बंटा नजर आया, हालांकि अन्य तीन पीठों के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ खड़े दिखे। शंकराचार्य का बिना स्नान किए प्रयागराज से जाना न केवल एक धार्मिक प्रकरण है, बल्कि यह शासन, सत्ता और धर्म के बीच बढ़ते टकराव का एक नया अध्याय लिख गया है।
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