
यूनिक समय, नई दिल्ली। पुरी नगरी एक बार फिर भक्ति, उल्लास और पारंपरिक उत्सव से सराबोर हो उठी है। आज भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर से वापसी की यात्रा पर निकलेंगे, जिसे बाहुड़ा यात्रा कहा जाता है। हर साल की तरह इस पवित्र परंपरा में लाखों श्रद्धालु ‘हरि बोल’ के उद्घोष और भगवा-सफेद ध्वजों के साथ रथ यात्रा के इस अंतिम चरण का हिस्सा बन रहे हैं।
क्या है ‘बाहुड़ा यात्रा’?
‘बाहुड़ा’ ओड़िया भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘वापसी’। यह रथ यात्रा का वह चरण होता है जब भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा नौ दिन के विश्राम के बाद गुंडिचा मंदिर से अपने मूल निवास श्रीमंदिर की ओर लौटते हैं।
तीनों भगवानों के रथ—बलभद्र का तालध्वज, सुभद्रा का दर्पदलन, और जगन्नाथ का नंदीघोष—अब दक्षिण की ओर मुड़ चुके हैं और गुंडिचा मंदिर के बाहर ‘नकाचना द्वार’ के समीप खड़े हैं।
मौसी मंदिर में विशेष भोग
परंपरा के अनुसार, वापसी के मार्ग में भगवानों का रथ अर्धासनी मंदिर पर थोड़ी देर रुकता है, जिसे मौसी मां का मंदिर भी कहा जाता है। यहां भगवानों को ओडिशा की पारंपरिक मिठाई पोड़ा पीठा का भोग अर्पित किया जाएगा, जो चावल, गुड़, नारियल और दाल से बनाई जाती है।
अनुष्ठानों से हुई शुरुआत
दिन की शुरुआत सुबह 4 बजे मंगला आरती से हुई। इसके बाद विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान जैसे तड़प लगी, रोजा होम, अबकाश, और सूर्य पूजा आयोजित किए गए। फिर द्वारपाल पूजा, गोपाल बलभ और सकाला धूप जैसे कर्मकांडों के साथ भगवानों को यात्रा के लिए तैयार किया गया।
‘पहंडी’ और छेरा पहंरा
दोपहर लगभग 12 बजे पहंडी अनुष्ठान शुरू होगा, जिसमें भगवानों को रथ तक लाया जाएगा। इसके बाद गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ‘छेरा पहंरा’ रस्म निभाएंगे, जिसमें वे सोने की झाड़ू से रथों की सफाई करके भक्ति और समानता का संदेश देते हैं।
रथ खींचने की शुरुआत
शाम 4 बजे से रथ खींचने की परंपरा शुरू होगी। सबसे पहले भगवान बलभद्र का रथ तालध्वज, फिर सुभद्रा का दर्पदलन और अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ आगे बढ़ेगा।
आगामी अनुष्ठान
- 6 जुलाई: सुनाबेशा का आयोजन होगा, जिसमें भगवान रथों पर स्वर्ण आभूषणों से सजेंगे।
- 8 जुलाई: नीलाद्री बिजे अनुष्ठान के साथ भगवान श्रीमंदिर में पुनः प्रवेश करेंगे और रथ यात्रा का विधिवत समापन होगा।
पुरी में इस महायात्रा को लेकर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं और हर दिशा में भक्तों की आस्था की लहरें उमड़ रही हैं। बाहुड़ा यात्रा न केवल धार्मिक यात्रा है, बल्कि यह आत्मा और परमात्मा के पुनर्मिलन का पर्व भी मानी जाती है।
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