
यूनिक समय, नई दिल्ली। तमिलनाडु के मदुरै स्थित थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीप जलाने को लेकर चल रहा दीपम विवाद अब एक बड़े न्यायिक और राजनीतिक मोड़ पर पहुँच गया है। मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस दीपम विवाद मामले में राज्य की डीएमके सरकार और दरगाह कमेटी की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया है।
न्यायमूर्ति जी जयचंद्रन और न्यायमूर्ति केके रामकृष्णन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सरकार द्वारा कानून-व्यवस्था बिगड़ने के बहाने को ‘हास्यास्पद’ और ‘काल्पनिक भूत’ करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा कि अपीलकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहे हैं कि दीपथून पर दीपक जलाने से किसी भी धार्मिक शास्त्र या ‘आगम शास्त्र’ का उल्लंघन होता है। हाईकोर्ट के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल आशंकाओं के आधार पर धार्मिक परंपराओं को नहीं रोका जा सकता।
अदालत ने डीएमके सरकार पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक शक्तिशाली राज्य का यह डर चौंकाने वाला है कि देवस्थानम के प्रतिनिधियों को साल के एक विशेष दिन पत्थर के स्तंभ पर दीप जलाने देने से जन शांति भंग हो जाएगी। पीठ के अनुसार, कानून और व्यवस्था की यह आशंका राज्य अधिकारियों द्वारा अपनी सुविधा के लिए गढ़ी गई थी ताकि एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ संदेह के घेरे में रखा जा सके। हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन को नसीहत दी कि उन्हें इस मुद्दे को समुदायों के बीच की खाई को पाटने और मध्यस्थता के एक अवसर के रूप में लेना चाहिए था, न कि इसे रोकने के लिए काल्पनिक खतरे पैदा करने चाहिए थे।
यह पूरा मामला तब और अधिक गरमा गया था जब एकल न्यायाधीश जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने कार्तिगई दीपम त्योहार के मौके पर दीप जलाने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार ने इस निर्देश का यह कहते हुए विरोध किया था कि चूंकि स्तंभ दरगाह के पास स्थित है, इसलिए इससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ सकता है।
विवाद इतना बढ़ा कि निर्देश पर अमल न होने के कारण जस्टिस स्वामीनाथन ने सीआईएसएफ की सुरक्षा में दीप जलाने तक की अनुमति दे दी थी। इसी के विरोध में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया ब्लॉक’ के 100 से अधिक सांसदों ने जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव तक पेश कर दिया था। हालांकि, अब खंडपीठ के फैसले ने साफ कर दिया है कि परंपराओं के निर्वहन में कानून-व्यवस्था की आड़ लेकर बाधा उत्पन्न करना अनुचित है।
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