
यूनिक समय, नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी भीषण सैन्य संघर्ष अब केवल दो देशों की जंग नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा असर आपकी जेब और रसोईघर तक पहुंचने वाला है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्ग ‘Strait of Hormuz’ (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) में बढ़ते तनाव ने वैश्विक गैस बाजार में खलबली मचा दी है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच छिड़ी इस जंग के कारण यदि यह समुद्री रास्ता बाधित होता है, तो आने वाले दिनों में भारत सहित पूरी दुनिया में एलएनजी (LNG) की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
क्यों अहम है Strait of Hormuz और क्या है खतरा?
Strait of Hormuz को दुनिया की ‘ऊर्जा धमनी’ (Energy Artery) माना जाता है क्योंकि यहाँ से होने वाली तेल और गैस की सप्लाई के आंकड़े वास्तव में चौंकाने वाले हैं। इस बेहद संकरे मार्ग से रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल कच्चे तेल की आवाजाही होती है, जो वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। केवल तेल ही नहीं, बल्कि दुनिया के कुल एलएनजी (LNG) व्यापार का 20 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
वर्तमान में खतरा तब और बढ़ गया है जब ईरान की सैन्य इकाई IRGC ने चेतावनी दी है कि वे इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बना सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समुद्री मार्ग कुछ हफ्तों के लिए भी बाधित होता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक बड़ी ‘आर्थिक सुनामी’ आ सकती है, जिससे पूरी दुनिया में ईंधन की भारी किल्लत और कीमतों में बेतहाशा वृद्धि होने का डर है।
आपकी जेब पर कैसे पड़ेगा असर?
एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) की आपूर्ति में आने वाली किसी भी बाधा का सीधा और गहरा असर आपकी जेब पर पड़ना तय है, क्योंकि इसका संबंध हमारे दैनिक जीवन के कई महत्वपूर्ण ईंधनों से है। सबसे पहले, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस महंगी होती है, तो घरों में इस्तेमाल होने वाली पाइप वाली रसोई गैस (PNG) की लागत बढ़ जाएगी, जिससे हर महीने का घरेलू बजट पूरी तरह बिगड़ सकता है।
इसी तरह, वाहनों के ईंधन के रूप में उपयोग होने वाली सीएनजी (CNG) की कीमतों में उछाल आने से न केवल निजी यात्रा बल्कि माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन भी महंगा होगा, जो सीधे तौर पर देश में महंगाई को बढ़ाएगा। इसके अलावा, बिजली उत्पादन और बड़े कारखानों में इस्तेमाल होने वाली औद्योगिक गैस की कीमतें बढ़ने से वहां बनने वाले उत्पादों की लागत भी बढ़ जाएगी, जिसका अंतिम भार उपभोक्ता यानी आपकी ही जेब पर पड़ेगा।
भारत के लिए ‘डबल झटका’
बाजार विशेषज्ञों और S&P Global के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, मिडिल ईस्ट का वर्तमान तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक ‘डबल झटके’ के समान है, क्योंकि भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग 50 से 55 प्रतिशत कच्चा तेल और एलएनजी (LNG) इसी संवेदनशील समुद्री मार्ग से मंगवाता है।
भारत की खाड़ी देशों पर निर्भरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश को मिलने वाली कुल एलएनजी आपूर्ति का लगभग 59 प्रतिशत हिस्सा अकेले कतर और यूएई (UAE) से आता है, जो सीधे तौर पर इस विवादित क्षेत्र से जुड़ा है। कोटक सिक्योरिटीज के एक्सपर्ट सुमित पोखरना के अनुसार, क्षेत्र में बढ़ते तनाव से न केवल सप्लाई बाधित हो सकती है, बल्कि वहां के ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचने का भी गंभीर खतरा है, जिससे पूरी वैश्विक सप्लाई चेन ध्वस्त हो सकती है।
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