
यूनिक समय, नई दिल्ली। माघ मेले में मौनी अमावस्या पर हुए भीषण विवाद के बाद अब संगम की रेती पर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। लखनऊ के उच्चाधिकारियों ने माघी पूर्णिमा के पावन अवसर पर ज्योतिर्मठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद महाराज को संगम स्नान के लिए मनाने की कवायद शुरू कर दी है। हालांकि, अपमान से आहत शंकराचार्य ने झुकने के बजाय शासन के सामने चार ऐसी शर्तें रख दी हैं, जिन्होंने शासन-प्रशासन की नींद उड़ा दी है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की 4 शर्तें
शंकराचार्य के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी शैलेंद्र योगीराज सरकार के अनुसार, इन मांगों के पूरा होने पर ही महाराज संगम में डुबकी लगाएंगे। जिसमें मौनी अमावस्या पर अभद्रता करने वाले जिम्मेदार अधिकारी सार्वजनिक रूप से लिखित में माफी मांगें, संन्यासियों, बटुकों और साधु-संतों की पिटाई करने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई के साथ एफआईआर दर्ज की जाए, गाय माता को आधिकारिक रूप से ‘राष्ट्रमाता’ घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हो, चारों पीठों के शंकराचार्यों के स्नान और आगमन के लिए एक स्थायी सरकारी प्रोटोकॉल निर्धारित किया जाए समेत ये चार मांगे शामिल है।
क्या था मौनी अमावस्या का विवाद?
18 जनवरी (मौनी अमावस्या) को जब शंकराचार्य अपने रथ और जुलूस के साथ संगम स्नान के लिए निकल रहे थे, तब प्रशासन ने सुरक्षा का हवाला देकर उनके रथ को रोक दिया। पुलिस ने उन्हें पैदल चलने को कहा, जिससे विवाद भड़क गया। आरोप है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने संन्यासियों और ब्राह्मण बटुकों के साथ मारपीट की, उनकी चोटी पकड़कर घसीटा और महाराज की पालकी का अपमान किया।
11 दिनों का धरना और ‘पहचान’ पर नोटिस
इस घटना से मर्माहत होकर महाराज 27 जनवरी तक अपने शिविर के बाहर सड़क पर धरने पर बैठे रहे। इस बीच मेला प्रशासन ने एक विवादित नोटिस जारी कर उनसे उनकी शंकराचार्य पद की प्रामाणिकता और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए साक्ष्य मांग लिए। साथ ही, उनकी भूमि आवंटन को निरस्त करने की चेतावनी भी दी गई, जिसे संतों ने हिंदू धर्म का अपमान करार दिया। इस प्रकरण ने तब राजनीतिक मोड़ ले लिया जब पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सहित कई विपक्षी नेताओं ने शंकराचार्य का समर्थन किया और सरकार पर संतों के अपमान का आरोप लगाया।
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