
यूनिक समय, नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में अधिसूचित 2026 की नई गाइडलाइंस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए फिलहाल रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान यूजीसी के नियमों पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि शिक्षा संस्थानों में छात्रों के बीच किसी भी तरह का अलगाव (Segregation) नहीं होना चाहिए।
विवाद की जड़:
23 जनवरी 2026 को यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए नए नियम जारी किए थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ये नियम केवल SC, ST और OBC के खिलाफ होने वाले भेदभाव को ही पहचानते हैं। सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों के लिए किसी ‘ग्रीवांस रिड्रेसल सिस्टम’ का प्रावधान नहीं है।
वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत में कहा कि कानून यह पहले से मानकर नहीं चल सकता कि भेदभाव केवल एक विशेष वर्ग के खिलाफ होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन नियमों में सवर्णों को ‘नेचुरल ऑफेंडर’ (स्वाभाविक अपराधी) की तरह देखा गया है, जो संविधान के खिलाफ है।
CJI की तीखी टिप्पणी:
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने समाज में बढ़ती दूरियों पर चिंता व्यक्त की। CJI ने कहा कि उत्तर भारत के छात्र का दक्षिण में या पूर्वोत्तर के छात्र का उत्तर भारत में अपनी संस्कृति के कारण उपहास उड़ना भी गंभीर है। क्या यूजीसी के नियम इसे कवर करते हैं? कोर्ट ने अलग हॉस्टल्स की बात पर नाराजगी जताते हुए कहा, “भगवान के लिए, हम ऐसे हॉस्टल्स में रहे हैं जहाँ सब साथ रहते थे। आज अंतरजातीय विवाह हो रहे हैं, ऐसे में समाज को बांटना प्रतिगामी कदम है।” CJI ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वे कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक समिति बनाने पर विचार करें, ताकि समाज बिना किसी भेदभाव के एक साथ आगे बढ़ सके।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
अदालत ने स्पष्ट किया कि कैंपस में छात्रों का किसी भी आधार पर बंटवारा नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने यूजीसी के इन नए नियमों के क्रियान्वयन (Implementation) पर रोक लगा दी है। अब इस मामले की विस्तृत समीक्षा की जाएगी और अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है।
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