
यूनिक समय, नई दिल्ली। AIMIM प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने बंगाली बोलने वाले मुस्लिम नागरिकों की कथित गिरफ्तारी पर केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश के कई हिस्सों में बंगाली भाषा बोलने वाले मुस्लिमों को अवैध रूप से हिरासत में लिया जा रहा है और उन्हें बांग्लादेशी बताकर निशाना बनाया जा रहा है।
ओवैसी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट के माध्यम से कहा कि इन नागरिकों को अवैध प्रवासी करार दिया जा रहा है, जबकि उनमें से अधिकतर भारत के गरीब तबके से आते हैं। इनमें झुग्गी-झोपियों में रहने वाले, घरेलू कामगार, सफाईकर्मी और कबाड़ी जैसे पेशों से जुड़े लोग शामिल हैं। ओवैसी का कहना है कि यह वर्ग पुलिस की ज्यादतियों का कानूनी तौर पर मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है, इसीलिए इन्हें बार-बार निशाना बनाया जा रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में भारतीय नागरिकों को जबरन बांग्लादेश भेजने की कोशिश की जा रही है, जो न केवल चिंताजनक है बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है। ओवैसी ने एक आधिकारिक दस्तावेज की तस्वीर भी साझा की, जिसमें राज्य सरकार द्वारा बांग्लादेशी नागरिकों और रोहिंग्याओं को देश से बाहर भेजने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) लागू किए जाने का उल्लेख है।
उनका कहना है कि महज किसी की भाषा के आधार पर उसे हिरासत में लेना न केवल गैरकानूनी है बल्कि असंवैधानिक भी है। उन्होंने इस प्रकार की पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कार्रवाई कानून के दायरे से बाहर है।
ओवैसी की यह प्रतिक्रिया पुणे में 23 जुलाई 2025 को पांच महिलाओं की गिरफ्तारी के बाद सामने आई है। फरासखाना पुलिस और एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट ने एक विशेष सूचना के आधार पर छापेमारी कर इन महिलाओं को गिरफ्तार किया। जांच में सामने आया कि वे बिना वैध दस्तावेजों के भारत में रह रही थीं और खुद को पश्चिम बंगाल की निवासी बताकर पुणे में रह रही थीं।
ओवैसी ने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक और सामाजिक भेदभाव की संज्ञा दी और कहा कि सरकार को गरीबों के खिलाफ कठोर रवैया अपनाने के बजाय न्यायपूर्ण और संवेदनशील रुख अपनाना चाहिए।
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