
यूनिक समय, नई दिल्ली। जापान की तीन प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनियाँ टोयोटा, होंडा और सुजुकी अब चीन पर अपनी निर्भरता कम करके भारत को अपना प्रमुख ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की तैयारी में हैं। इन तीनों कंपनियों ने मिलकर भारत में लगभग $11 बिलियन डॉलर (करीब ₹90,000 करोड़) का बड़ा निवेश करने की योजना बनाई है।
निवेश और विस्तार की मुख्य बातें:
जापानी कंपनियाँ चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की कीमतों की जंग और चीनी कंपनियों की दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण सतर्क हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत, चीनी प्रतिस्पर्धा (जैसे BYD) से दूर होने के कारण जापान के लिए एक बेहतर विकल्प है। 2021 से 2024 के बीच जापान का भारत के परिवहन क्षेत्र में निवेश सात गुना बढ़कर 294 अरब येन तक पहुँच गया, जबकि चीन में इसी अवधि में निवेश में 83% की गिरावट आई।
सुजुकी, जो भारत में 40% बाजार हिस्सेदारी रखती है, अपनी भारतीय यूनिट मारुति सुजुकी के माध्यम से $8 बिलियन का निवेश कर रही है। इससे उसकी उत्पादन क्षमता 2.5 मिलियन से बढ़कर 4 मिलियन कारें प्रति वर्ष हो जाएगी। कंपनी के अध्यक्ष तोशिहिरो सुजुकी ने भारत को ‘सुजुकी का ग्लोबल प्रोडक्शन हब’ बनाने की बात कही है।
टोयोटा ने 15 नए और अपडेटेड मॉडल लॉन्च करने तथा ग्रामीण नेटवर्क को मजबूत करने का लक्ष्य रखा है। वह हाइब्रिड कारों के पार्ट्स का स्थानीय उत्पादन बढ़ा रही है। कंपनी अपने प्लांट की क्षमता में सालाना 1 लाख गाड़ियों का इजाफा करेगी और 2030 से पहले महाराष्ट्र में नया प्लांट लगाकर कुल क्षमता 10 लाख गाड़ियाँ सालाना पार कर जाएगी।
होंडा भारत को अपनी इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की ग्लोबल स्ट्रैटेजी का अहम हिस्सा बना रही है। 2027 से कंपनी भारत में “जीरो सीरीज” इलेक्ट्रिक कारें बनाकर जापान और अन्य एशियाई देशों में निर्यात करेगी। होंडा के सीईओ ने भारत को अमेरिका के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण बाजार बताया है।
निवेश को बढ़ावा देने वाले कारक:
भारत की 8% की औसत जीडीपी ग्रोथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ नीति ने इस निवेश को आकर्षक बनाया है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीनी कंपनियों पर निवेश प्रतिबंध भी जापानी वाहन निर्माताओं के लिए एक अवसर साबित हुआ है।
हालांकि, घरेलू कंपनियाँ जैसे टाटा मोटर्स और महिंद्रा एंड महिंद्रा एसयूवी सेगमेंट में तेजी से बढ़कर सुजुकी के मार्केट शेयर को चुनौती दे रही हैं, जो महामारी-पूर्व के 50% से घटकर 40% के आसपास आ गया है।
जापान का यह कदम वैश्विक सप्लाई चेन के पुनर्गठन को दर्शाता है, जहाँ भारत अगले दशक में एशिया का सबसे महत्वपूर्ण ऑटो ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की राह पर है।
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