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West Bengal: मतदाता सूची में भारी खेल, एक ही ‘पिता’ के 389 बच्चे; चुनाव आयोग के खुलासे से सुप्रीम कोर्ट भी हैरान

by Tarun Bhardwaj • January 20, 2026
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यूनिक समय, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में सुधार के लिए चलाए गए एसआईआर अभियान के दौरान ऐसे चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं, जिन्होंने न केवल चुनाव आयोग बल्कि सुप्रीम कोर्ट को भी हैरान कर दिया।

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि राज्य की कई विधानसभा सीटों पर सैकड़ों मतदाताओं ने एक ही व्यक्ति को अपना पिता दर्ज कर रखा है। 2025 की मतदाता सूची में आसनसोल जिले की बाराबनी विधानसभा सीट में एक व्यक्ति को 389 मतदाताओं का पिता बताया गया है, वहीं हावड़ा जिले की बाली विधानसभा सीट में एक अन्य व्यक्ति 310 मतदाताओं का पिता दर्ज है।

सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के सामने चुनाव आयोग के वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि ये सभी मामलों “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” यानी तार्किक विसंगति की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों में संबंधित मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं और सही रिकॉर्ड दर्ज कराने की जिम्मेदारी मतदाताओं की ही है।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, केवल ये दो मामले ही नहीं हैं। राज्य में सात ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें 100 से अधिक मतदाताओं का माता-पिता दर्ज किया गया है। इसके अलावा 10 लोगों को 50 या उससे अधिक मतदाताओं का अभिभावक, 10 अन्य 40 से अधिक, 14 लोग 30 से अधिक और 50 लोग 20 से अधिक मतदाताओं के माता-पिता के रूप में दर्ज हैं। बड़ी संख्या में 8,682 लोगों को 10 से अधिक, 2,06,056 लोगों को 6 से अधिक और 4,59,054 लोगों को 5 से अधिक मतदाताओं का माता-पिता बताया गया है।

चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2019-21 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत में औसत परिवार का आकार केवल 4.4 है। ऐसे में एक व्यक्ति से 50 या उससे अधिक मतदाताओं का जुड़ा होना असामान्य है और इसकी गंभीर जांच की जरूरत है।

आयोग ने कहा कि जिन मामलों में छह या उससे अधिक मतदाता एक ही व्यक्ति से माता-पिता के रूप में जुड़े पाए गए हैं, उन्हें विशेष ध्यान से परखा जा रहा है। इसके अलावा नोटिस जारी करने के चार अन्य आधार भी सामने आए हैं, जैसे: मतदाता का नाम 2025 की सूची में 2002 की सूची से मेल न करना, मतदाता और माता-पिता की उम्र में 15 साल से कम का अंतर, उम्र का अंतर 50 साल से ज्यादा, और मतदाता तथा दादा-दादी की उम्र में 40 साल से कम अंतर।

इन खुलासों ने बंगाल की मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि इन विसंगतियों को दूर करना आवश्यक है ताकि मतदाता सूची पूरी तरह शुद्ध, पारदर्शी और भरोसेमंद बन सके।

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