
यूनिक समय, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल सरकार और उसके कर्मचारियों के बीच वर्षों से चल रहे महंगाई भत्ते (DA) के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने करीब 20 लाख राज्य कर्मचारियों के हक में फैसला देते हुए साफ कर दिया कि DA कोई दान नहीं, बल्कि कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है। कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को निर्देश दिया है कि साल 2008 से 2019 तक की अवधि का पूरा बकाया (Arrears) भुगतान किया जाए।
6 मार्च तक जारी करना होगा 25% बकाया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश का हवाला देते हुए राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिया कि बकाया राशि का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा 6 मार्च, 2026 तक हर हाल में जारी कर दिया जाए। इससे पहले राज्य सरकार ने फंड की कमी का हवाला देते हुए समय सीमा बढ़ाने की गुहार लगाई थी, जिसे कोर्ट ने सीमित राहत के साथ स्वीकार किया है।
बकाया भुगतान के लिए ‘हाई-पावर कमेटी’ का गठन
सुप्रीम कोर्ट ने बाकी 75 प्रतिशत DA के भुगतान और इसके सटीक वित्तीय प्रबंधन के लिए एक विशेष चार सदस्यीय ‘हाई-पावर कमेटी’ बनाने का आदेश दिया है, जिसकी संरचना को बेहद प्रभावशाली रखा गया है। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जस्टिस इंदु मल्होत्रा करेंगी और इसमें दो सेवानिवृत्त हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के साथ ही एक वरिष्ठ सीएजी (CAG) अधिकारी को सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा। यह उच्चाधिकार प्राप्त समिति मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल सरकार की वर्तमान वित्तीय स्थिति का बारीकी से आकलन करेगी और कर्मचारियों के वर्षों से लंबित बकाया भुगतान के उचित तौर-तरीकों व समय-सीमा का निर्धारण करेगी।
फैसले का आधार
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि महंगाई भत्ता वेतन की गणना के लिए ROPA (Revision of Pay and Allowances) नियमों का हिस्सा है। इसलिए, इसे रोकना या देरी करना नियमों का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि 2009-19 तक का बकाया देना सरकार की जिम्मेदारी है।
केंद्र और राज्य के बीच DA का बड़ा अंतर
पश्चिम बंगाल में महंगाई भत्ते (DA) का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है क्योंकि वहां केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों के बीच डीए का एक विशाल अंतर मौजूद है। वर्तमान स्थिति के अनुसार 1 अप्रैल 2025 से बंगाल सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए मूल वेतन का 18 प्रतिशत डीए तय किया था लेकिन यह केंद्र सरकार के मानकों की तुलना में काफी कम है। हकीकत यह है कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तुलना में पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों का डीए अभी भी लगभग 40 प्रतिशत कम बना हुआ है और इसी बड़ी विसंगति को लेकर विभिन्न कर्मचारी संगठन लगातार सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
नोट: यूनिक समय को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।
Leave a Reply