
यूनिक समय, नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला कजरी तीज का पर्व सुहागिन स्त्रियों के लिए अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है। इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य और अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और स्थिरता के लिए व्रत रखती हैं। यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर भारत के कई राज्यों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।
पौराणिक महत्व और परंपरा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। तभी से, यह व्रत विवाहित स्त्रियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि जो महिलाएं इस दिन पूरी श्रद्धा से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं, उन्हें वैवाहिक सुख और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, जो सौभाग्य और समर्पण का प्रतीक है। त्योहार का सांस्कृतिक महत्व भी बहुत गहरा है, जिसमें महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनकर झूले झूलती हैं और कजरी गीत गाती हैं।
पूजा विधि और व्रत का विधान
कजरी तीज के दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। पूजा स्थल पर भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की मूर्ति या चित्र स्थापित कर मंडप सजाया जाता है। पूजा की शुरुआत भगवान गणेश की स्तुति से होती है।
- भगवान शिव को गंगाजल, दूध, शहद, दही और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं।
- माता पार्वती को सिंदूर, कुमकुम, चूड़ी और अन्य श्रृंगार सामग्री चढ़ाई जाती है।
- पूरी पूजा के दौरान ‘ॐ नमः शिवाय’ और ‘ॐ पार्वत्यै नमः’ मंत्रों का जाप किया जाता है।
यह व्रत निर्जल होता है, जिसमें महिलाएं पूरे दिन बिना अन्न और जल के रहती हैं। शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। यह व्रत वैवाहिक जीवन में प्रेम और एकता को मजबूत करने का प्रतीक माना जाता है।
ये भी पढ़ें: Mathura News: मथुरा में भाजपा की तिरंगा यात्रा के दौरान मारपीट, वायरल हुआ वीडियो
Leave a Reply