
यूनिक समय, नई दिल्ली। राज्यसभा में मंगलवार को ऑपरेशन सिंदूर को लेकर हुई चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। खरगे ने सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए, जिनमें पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहायता मिलने पर भारत की प्रतिक्रिया, गृह मंत्री की जिम्मेदारी, और प्रधानमंत्री की चुप्पी जैसे मुद्दे शामिल थे।
खरगे ने सवाल उठाया कि जब पाकिस्तान को युद्धविराम के बाद वर्ल्ड बैंक और IMF से वित्तीय मदद मिली, तो भारत ने इसका विरोध क्यों नहीं किया। इसी टिप्पणी पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह तत्काल अपनी सीट से खड़े हो गए और जवाब देने लगे। हालांकि, विपक्षी सांसदों के शोरगुल के बीच उन्होंने संक्षिप्त प्रतिक्रिया दी और फिर अपनी सीट पर लौट गए।
चर्चा के दौरान मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था, लेकिन उसका कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने तंज कसा कि “हमारे पत्रों को कचरे में डाल दिया जाता है… अगर इतना घमंड है, तो एक दिन वह घमंड टूटेगा।”
खरगे ने पहलगाम आतंकी हमले को लेकर सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब आतंकी हमले की इतनी बड़ी घटना हुई, तो जिम्मेदारी किसकी है? क्या यह गृह मंत्री की जवाबदेही नहीं बनती? उन्होंने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी लेने को भी सरकार की रणनीति बताया और पूछा कि क्या इससे गृह मंत्री को बचाने की कोशिश हो रही है।
सेना की बहादुरी की सराहना करते हुए खरगे ने कहा कि देश को अपनी सेना पर गर्व है, लेकिन सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच रही है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा, “ये सरकार पहाड़ खोदकर चूहा निकालने का काम करती है।”
इसके अलावा, उन्होंने प्रधानमंत्री की विदेश नीति पर भी टिप्पणी करते हुए कहा, “आप बिना बुलाए जाकर गले लगते हैं, लेकिन देश के नेताओं की चिट्ठियों का जवाब देने का वक्त नहीं है।”
खरगे ने यह भी जोड़ा कि जब ये नेता बच्चे थे तो ‘चाचा नेहरू आए’ कहते थे, लेकिन आज वही नेहरू जी की आलोचना करते हैं। उन्होंने सरकार पर ‘झूठ का कारखाना’ चलाने का आरोप लगाया और कहा कि सच्चाई बोलने और सुनने का साहस होना चाहिए।
यह बहस विपक्ष और सरकार के बीच बढ़ते तनाव को और उजागर करती है, खासकर ऐसे समय में जब सुरक्षा और जवाबदेही जैसे गंभीर मुद्दों पर संसद में स्पष्टता की मांग की जा रही है।
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