
यूनिक समय, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना में दलबदल करने वाले भारत राष्ट्र समिति (BRS) के विधायकों की अयोग्यता पर तेजी से निर्णय लेने का निर्देश विधानसभा अध्यक्ष को दिया है। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि इसमें देरी होती है, तो यह लोकतंत्र के लिए हानिकारक हो सकता है। कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है जब कांग्रेस में शामिल हुए बीआरएस के 10 विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं पर पिछले सात महीनों से कोई निर्णय नहीं हुआ है।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि यदि स्पीकर समय पर कार्रवाई नहीं करते, तो यह “ऑपरेशन सफल, मरीज मृत” जैसी स्थिति होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला संविधान की 10वीं अनुसूची से जुड़ा है, जिसके तहत दल-बदल के मामलों में स्पीकर को त्वरित निर्णय लेना होता है। पीठ ने स्पीकर को यह भी हिदायत दी कि वे विधायकों को इस प्रक्रिया में देरी न करने दें, और यदि ऐसा होता है तो उनके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
तेलंगाना में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राजनीतिक दल-बदल देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर खतरा हैं और यदि इन्हें नहीं रोका गया तो यह पूरी प्रणाली को अस्थिर कर सकता है। कोर्ट ने संसद से भी आग्रह किया कि वह इस पर विचार करे कि क्या दल-बदल के मामलों में स्पीकर को ही निर्णय देने का मौजूदा तंत्र उचित है या इसमें बदलाव की आवश्यकता है।
कोर्ट ने तेलंगाना हाई कोर्ट के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि स्पीकर ‘उचित समय’ में फैसला लें। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऐसे आदेशों से केवल कार्रवाई में देरी हुई है, जबकि संविधान की मंशा ऐसे मामलों में तत्काल निर्णय लेने की है।
सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी व्यक्त की कि स्पीकर ने सात महीने तक अयोग्यता याचिकाओं पर कोई नोटिस तक जारी नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि जब ऐसी याचिकाओं पर इतनी देरी होती है, तो यह लोकतंत्र को कमजोर करता है। केवल कोर्ट में याचिका दाखिल होने के बाद नोटिस जारी करना न्यायिक प्रक्रिया का अपमान है।
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