India News: IIT मद्रास में गरजे एस. जयशंकर; ‘पड़ोसियों के लिए उठती हुई लहर है भारत की तरक्की’

IIT मद्रास में गरजे एस. जयशंकर

यूनिक समय, नई दिल्ली। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शुक्रवार को IIT मद्रास के छात्रों के बीच भारत की वैश्विक साख और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के असली अर्थ पर एक प्रभावशाली संबोधन दिया। उन्होंने न केवल भारत की प्राचीन सभ्यता और लोकतंत्र की मजबूती का जिक्र किया, बल्कि यह भी बताया कि कैसे संकट के समय भारत ने दुनिया के लिए एक ‘उम्मीद की किरण’ बनकर काम किया।

वैक्सीन डिप्लोमेसी:

कोविड महामारी के दौर को याद करते हुए जयशंकर ने विकसित देशों के स्वार्थ और भारत की उदारता के बीच का अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि पश्चिमी देशों ने अपनी जरूरत से 8 गुना ज्यादा वैक्सीन स्टॉक कर ली थी, लेकिन छोटे देशों को 10 हजार डोज देने के लिए भी तैयार नहीं थे।

जयशंकर ने भावुक होते हुए कहा कि लैटिन अमेरिका और पैसिफिक देशों के लोग आज भी कहते हैं कि अगर भारत मदद न करता, तो उन्हें ‘वैक्सीन सूंघने को भी न मिलती’। उन्होंने जोर देकर कहा कि घर और विदेश की समस्याओं को अलग नहीं देखा जा सकता। भारत ने अपनी 1.4 अरब आबादी की चिंता करते हुए भी दुनिया के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई।

पड़ोसियों पर स्पष्ट संदेश

हाल ही में बांग्लादेश के दौरे से लौटे जयशंकर ने पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों पर भारत की नीति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि वे पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने बांग्लादेश गए थे। उन्होंने कहा कि भारत का स्वभाव हमेशा मदद करने का है, बशर्ते पड़ोसी कम से कम हानि न पहुंचाए। श्रीलंका को दिए गए 4 अरब डॉलर के पैकेज का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जब आईएमएफ (IMF) भी धीमा था, तब भारत सबसे पहले खड़ा हुआ। जयशंकर का संदेश साफ था— “ज्यादातर पड़ोसी जानते हैं कि भारत की तरक्की एक उठती लहर है। अगर भारत बढ़ेगा, तो पूरा क्षेत्र बढ़ेगा।”

लोकतंत्र और प्राचीन सभ्यता का गौरव

विदेश मंत्री ने भारत की ऐतिहासिक विरासत पर गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि हम दुनिया की उन विरल सभ्यताओं में से हैं जो आज एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में जीवित हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यदि भारत लोकतंत्र नहीं अपनाता, तो यह विचार केवल कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह जाता। भारत ने इसे एक ‘यूनिवर्सल आइडिया’ बना दिया है।

वसुधैव कुटुम्बकम शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने कभी दुनिया को दुश्मन या खतरे के रूप में नहीं देखा जिससे खुद को बचाना पड़े, बल्कि हमने इसे एक परिवार की तरह माना है।

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