
यूनिक समय, नई दिल्ली। भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच पिछले दो दशकों से चला आ रहा इंतज़ार खत्म हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर मुहर लगाते हुए इसे व्यापार जगत की “मदर ऑफ ऑल डील्स” करार दिया है। इस समझौते ने न केवल वैश्विक कूटनीति में भारत का कद बढ़ाया है, बल्कि भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर और लग्जरी कार प्रेमियों के लिए खुशियों के दरवाजे खोल दिए हैं।
लग्जरी कारों की कीमतों में आएगी भारी गिरावट
इस समझौते की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली बात कारों पर लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) में की गई कटौती है। अब तक यूरोप से आने वाली कारों पर 110% का भारी-भरकम टैक्स लगता था, जिसे घटाकर अब मात्र 10% कर दिया गया है। यह रियायत सालाना 2,50,000 गाड़ियों के कोटा पर लागू होगी। यानी हर साल यूरोप से आने वाली शुरुआती 2.5 लाख कारों पर ही यह कम टैक्स लगेगा। इस फैसले से मर्सिडीज-बेंज, बीएमडब्ल्यू, ऑडी, फॉक्सवैगन और रेनो जैसी कंपनियों की गाड़ियां भारत में काफी सस्ती हो जाएंगी।
प्रधानमंत्री मोदी का विजन
प्रधानमंत्री मोदी ने इस डील को भारत की बढ़ती वैश्विक आर्थिक ताकत का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कहा कि “यह मुक्त व्यापार समझौता दुनिया भर के निवेशकों के लिए भारत में विश्वास को और मजबूत करेगा। यह साझेदारी वैश्विक सप्लाई चेन को सुदृढ़ करेगी और दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग की एक नई मिसाल पेश करेगी।”
ईवी (EV) को नहीं मिली राहत
जहाँ पेट्रोल-डीजल कारों के लिए जश्न का माहौल है, वहीं इलेक्ट्रिक वाहन (EV) सेक्टर के लिए खबर थोड़ी अलग है। सूत्रों के अनुसार, इस एफटीए डील में इलेक्ट्रिक वाहनों को कोई टैक्स छूट नहीं दी गई है। टेस्ला या अन्य यूरोपीय ईवी कंपनियों को भारतीय बाजार में प्रवेश के लिए अभी भी मौजूदा ऊंचे टैक्स ढांचे का ही पालन करना होगा।
19 साल का लंबा संघर्ष
इस समझौते का सफर आसान नहीं रहा है। बातचीत 2007 में शुरू हुई, 2013 में रुकी और फिर 2022 में नए सिरे से शुरू होकर 2026 में मुकाम तक पहुँची। जापान और दक्षिण कोरिया के बाद भारत तीसरा ऐसा एशियाई देश बन गया है जिसने यूरोपीय संघ के साथ इतनी बड़ी डील फाइनल की है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और ईयू के बीच 190 अरब डॉलर का व्यापार हुआ है, जिसके इस समझौते के बाद रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुँचने की उम्मीद है।
भारतीय उद्योग पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय कारों के सस्ते होने से घरेलू प्रीमियम कार बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिसका सीधा लाभ भारतीय ग्राहकों को बेहतर तकनीक और कम कीमतों के रूप में मिलेगा। साथ ही, इससे भारत में सर्विस और कंपोनेंट सेक्टर में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
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