
यूनिक समय, नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित “संघ यात्रा के 100 वर्ष-नए क्षितिज” कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ की विचारधारा, कार्यप्रणाली और भविष्य के लक्ष्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। मुंबई में आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ को दूर से देखने पर गलतफहमियां हो सकती हैं, इसे समझने के लिए संघ की शाखा और स्वयंसेवकों के आचरण को देखना अनिवार्य है।
संघ क्या है और क्या नहीं?
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की पहचान को लेकर चल रहे कयासों पर विराम लगाते हुए स्पष्ट किया कि संघ किसी के विरोध या प्रतिस्पर्धा में नहीं बना है। उन्होंने भ्रम का निवारण करते हुए कहा कि यद्यपि स्वयंसेवक रूट मार्च करते हैं और लाठी चलाना सीखते हैं, फिर भी यह कोई पैरामिलिट्री सैन्य संगठन या अखाड़ा नहीं है। इसी तरह, उन्होंने यह भी साफ किया कि संघ स्वयं कोई राजनीतिक दल नहीं है और न ही बीजेपी संघ की पार्टी है, भले ही इसके स्वयंसेवक राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हों। इसके अतिरिक्त, उन्होंने बताया कि संघ में घोष की धुन और व्यक्तिगत गीतों का महत्व होने के बावजूद यह कोई अखिल भारतीय संगीतशाला या संगीत विद्यालय नहीं है, बल्कि इसका मूल उद्देश्य संपूर्ण समाज को संगठित करना है।
“हिंदू संज्ञा नहीं, विशेषण है”
हिंदू शब्द की व्याख्या करते हुए भागवत ने कहा कि इसे केवल पूजा पद्धति या कर्मकांड तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा “हिंदू एक विशेष समुदाय या रिलीजन का नाम नहीं है। हिंदू कोई ‘संज्ञा’ (Noun) नहीं बल्कि एक ‘विशेषण’ (Adjective) है। भारत में रहने वाले सभी हिंदू हैं क्योंकि यह हमारी साझा संस्कृति और पहचान है।”
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत के मुसलमान और ईसाई दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले अलग हैं क्योंकि उनकी जड़ें इसी संस्कृति से जुड़ी हैं। साथ ही उन्होंने ‘धर्मनिरपेक्षता’ (Secularism) के बजाय ‘पंथनिरपेक्षता’ शब्द को अधिक सटीक बताया।
देश में चार तरह के हिंदू
मोहन भागवत ने वर्तमान परिदृश्य में हिंदुओं के आत्मचिंतन पर जोर देते हुए उन्हें चार श्रेणियों में विभाजित किया है, जिनमें पहली श्रेणी उन लोगों की है जो गर्व से अपनी हिंदू पहचान व्यक्त करते हैं, जबकि दूसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो सामान्य रूप से इसे स्वीकारते हैं। तीसरी श्रेणी में उन्होंने उन लोगों को रखा है जो असुरक्षा के कारण डरे हुए हैं और अपनी पहचान को सार्वजनिक रूप से बोलने में हिचकिचाते हैं, और चौथी श्रेणी उन लोगों की है जो पूरी तरह से यह भूल चुके हैं कि वे हिंदू हैं।
शाखा ही संघ की आत्मा
सरसंघचालक ने कहा कि संघ को लोकप्रियता या सत्ता की भूख नहीं है। संघ का एकमात्र लक्ष्य समाज को संगठित करना है। उन्होंने उदाहरण दिया कि अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों का उत्थान तभी हुआ जब वहां का समाज तैयार हुआ। उन्होंने आह्वान किया कि जो आज संघ का विरोध कर रहे हैं, वे भी इसी समाज का अंग हैं और उन्हें भी साथ लेकर चलना संघ का कर्तव्य है।
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