
यूनिक समय, नई दिल्ली। भारत और जर्मनी के संबंधों में आज एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ अपनी दो-दिवसीय आधिकारिक भारत यात्रा के पहले चरण में आज अहमदाबाद पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी यह मुलाकात केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े समझौतों में से एक की नींव रखने वाली है।
साबरमती से शुरू हुआ सफर
चांसलर मर्ज़ और पीएम मोदी ने अपने दिन की शुरुआत साबरमती आश्रम में महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देकर की। इसके बाद दोनों नेताओं ने साबरमती रिवरफ्रंट पर इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल का उद्घाटन किया। यह सांस्कृतिक संगम भारत-जर्मनी की 25 साल पुरानी रणनीतिक साझेदारी की मजबूती को दर्शाता है।
$8 बिलियन की सबमरीन डील
इस यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण प्रोजेक्ट-75I है। भारतीय नौसेना की ताकत को कई गुना बढ़ाने के लिए करीब 8 अरब डॉलर (66,000 करोड़ रुपये से अधिक) की डिफेंस डील पर अंतिम मुहर लग सकती है। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत भारतीय नौसेना के लिए 2500 टन वजनी अत्याधुनिक टाइप 214NG सबमरीन का निर्माण किया जाएगा, जो ‘एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन’ तकनीक के कारण गहरे पानी में लंबे समय तक रहने की क्षमता रखती हैं। यह समझौता जर्मन इंजीनियरिंग विशेषज्ञता और भारत के ‘मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड’ (MDL) के कौशल का एक अनूठा संगम है, जो ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाएगा।
आर्थिक मोर्चे पर चांसलर मर्ज़ के साथ आए 25 बड़ी जर्मन कंपनियों के मुख्य कार्यकारियों का दल यह स्पष्ट करता है कि जर्मनी भारत को एक स्थिर और विश्वसनीय व्यापारिक साझेदार के रूप में देख रहा है। वर्तमान में 51.23 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार और भारत में जर्मनी का 9वां सबसे बड़ा निवेशक होना इस रिश्ते की मजबूती का प्रमाण है।
रक्षा के साथ-साथ ग्रीन एनर्जी इस यात्रा का दूसरा सबसे बड़ा स्तंभ है, जहाँ जर्मनी की सरकारी कंपनी ‘यूनिपर’ भारत से सालाना 2.5 लाख मीट्रिक टन ग्रीन अमोनिया खरीदने के लिए समझौते को अंतिम रूप दे सकती है। यह सहयोग न केवल जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करेगा, बल्कि भारत को दुनिया के ग्रीन हाइड्रोजन हब के रूप में भी स्थापित करेगा। शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में होने वाली गहन चर्चा यह सुनिश्चित करेगी कि भारत और जर्मनी के बीच की यह साझेदारी आने वाले दशकों तक वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करती रहे।
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