ब्रज भ्रमण: वृंदावन का वह मंदिर जहां कोई नहीं जाता

“पत्थर भी वही,  कारीगरी भी वहीं,  इतिहास भी वहीं फिर क्यों वहीं वर्तमान नहीं। केशी घाट के पास उदास खड़ा मैं रोज वृंदावन से यह सवाल करता हूँ। क्योंकि मैं मूरत विहीन हूँ?  क्या मेरे पट कभी नहीं खुलेंगे?  क्या इस जगमोहन में कभी आस्था की पदचाप नहीं होगी?

मैं जुगल किशोर मंदिर बरसों से नितांत अकेला हूं। यूं तो श्रीधाम में हर दिन हजारों श्रद्धालु आते हैं पर किसी का रुख मेरी तरफ नहीं होता। जैसे मैं मौजूद होकर भी नहीं हूं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की संरक्षित इमारतों में एक मैं भी हूं, ताले में बंद, बेबस… ।”

यह करुण गाथा ऐतिहासिक जुगल किशोर मंदिर की है।   जहांगीर काल में निर्मित यह मंदिर भी गोविंद देव,  मदन मोहन,  गोपीनाथ की तरह खंडित हुआ पर उस दर्द से कभी उबर नहीं सका। अन्य देवालयों में प्रतिभू विग्रह स्थापित किए गए पर यह मंदिर तब से सूना पड़ा है।

खंडहरों और मकानों के बीचोंबीच स्थित जुगल किशोर का कला सौष्ठव दर्शनीय है। मुख्य द्वार पर शिखरनुमा गिरिराज धारण करते गिरिधारी व लाठि टेके खड़े सखाओं की सुंदर आकृति उभरी है। द्वार पर पुष्प, पक्षी आदि का सुंदर अलंकरण है। आक्रमण के बाद मंदिर का मध्य भाग क्षतिग्रस्त हो गया था एएसआई ने इसका जीणोद्धार कराया है। मंदिर का शिखर व अमला कलात्मक है।

इतिहास

नौनाकरण नामक राजपूत ने जहांगीर के शासन काल में सन् 1627 (संवत 1684) में जुगल किशोर मंदिर का निर्माण कराया था। ग्राउस का अनुमान है कि वह गोपीनाथ मंदिर के निर्माता रायसेन का बड़ा भाई था। औरंगजेब के काल में खंडित होने के बावजूद यह प्राचीन मंदिरों की अपेक्षा कुछ ठीक दशा में है। इसके शिखर और आमलक से इसकी सुंदर वास्तुकला झलकती है| जुगल किशोर की मूर्ति के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है।

 

युगल घाट के युगल बिहारी

वृन्दावन में युगल किशोर नाम के तीन प्रसिद्ध मंदिर हैं। व्यास घेर स्थित हरिराम व्यास के सेव्य युगल किशोर का प्राचीन मंदिर खंडहर हो चुका है। तीसरा युगल बिहारी का मंदिर युगल घाट पर स्थित है। लाल पत्थर से निर्मित शिखरदार शैली का प्राचीन मंदिर दर्शनीय है। जयपुर के ठाकुर गोविंद दास और हरिदास तूंवर नामक दो भाइयों ने इस देवालय का निर्माण कराया था । निंबार्क संप्रदाय से जुड़े मंदिर में ठाकुर जी को प्रतिदिन यमुना जल से स्नान कराया जाता है। वृंदावनदास रचित काव्य ग्रंथ प्राचीन ब्रज चौरासी परिक्रमा में लिखा है कि ‘ युगल घाट पर लाड़िली लाल सखियों के साथ विहार करते थे ‘।

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*