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राजधानी दिल्ली में करीब 60 प्रतिशत मतदान हुआ। पिछले चुनाव की अपेक्षा इस बार करीब साढ़े सात लाख लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया। यदि दिल्ली के सभी मतदाताओं की बात करें, तो यह आंकड़ा 56 लाख बनता है, यानी इन लोगों ने अपना वोट नहीं डाला। यह आंकड़ा दो संसदीय क्षेत्रों के बराबर है। देखा जाए तो राजधानी में मतदाताओं ने तीनों ही पार्टियों के प्रति विश्वास नहीं दिखाया और उन्हें राष्ट्रवाद, पूर्ण राज्य और विकास आदि नारों ने प्रभावित नहीं किया। सीलिंग, तोड़फोड़ व इन पार्टियों की आपसी लड़ाई ने उनका मोहभंग कर दिया।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 65 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया था। इस बार अपेक्षा से कम 60 प्रतिशत का आंकड़ा काफी मुश्किल से पार हो सका। इससे साफ है कि मतदाताओं की रुचि मतदान के प्रति कम हुई है। राजधानी में एक करोड़ 43 लाख से ज्यादा मतदाता हैं और इनमें से करीब 56 लाख से ज्यादा लोगों ने मतदान में रुचि नहीं दिखाई। पिछले चुनाव को देखें, तो भी करीब साढ़े लाख लोगों ने मतदान कम किया।
चुनाव आयोग के अथक प्रयास भी मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाने में विफल रहे। मतदान में मतदाताओं की रुचि कम होने के पीछे देखा जाए, तो तीनों पार्टियां जिम्मेदार रही हैं। पूरे पांच वर्ष केंद्र व दिल्ली सरकार के बीच टकराव में ही गुजरे। ऐसा कोई दिन नहीं गया, जब भाजपा व आप के नेताओं के बीच टकराव सुर्खियों में नहीं रहा। आप सरकार के मुख्य सचिव से कथित मारपीट, अधिकारियों की नियुक्ति और उपराज्यपाल से टकराव चर्चा में रहा, तो केंद्र सरकार द्वारा एक के बाद दिल्ली सरकार के अधिकारों में कटौती भी मुद्दा रहा।
रही सही कसर राजधानी में सीलिंग और तोड़फोड़ ने पूरी कर दी। लोगों के रोजगार खत्म हो गए, हल किसी भी पार्टी ने नहीं निकाला, बल्कि इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया गया। वहीं कांग्रेस ने भी ठोस हल निकालने की दिशा में कोई कदम उठाने के लिए सरकार को मजबूर करने की अपेक्षा यही दर्शाया कि उनकी सरकार होती तो यह नौबत न आती।
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