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यूनिक समय, वृंदावन। यमुना तट पर कुंभ पूर्व वैष्णव बैठक (मेला) के शुभारंभ के साथ पूरा क्षेत्र श्रद्धा, भक्ति और आस्था का केंद्र बन गया है। तीन अनि और उनके अखाड़ों के श्रीमहंतों ने ध्वज पूजन किया और उसके बाद उसे मंत्रोच्चारों के मध्य स्थापित किया। प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा एवं सांसद हेमामालिनी ने भाग लिया।
बसंत पंचमी पर्व पर श्रद्धालुओं ने कुंभ मेला क्षेत्र स्थित यमुना में डुबकी लगाई।पंच निर्वाणी अनि अखाड़ा के महंत धर्मदास, पंच दिगंबर अनि अखाड़े के महंत किशन दास, महंत गौरी शंकर दास, महंत राजेंद्र दास एवं महंत लाल शरण दास ने विधिविधान से ध्वज का पूजन किया। फिर धर्म ध्वज को स्थापित किया गया। प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने सांसद हेमामालिनी ने धर्म ध्वज का पूजन कर आरती की।
काठिया बाबा आश्रम के महंत रासबिहारी दास महाराज की अगुवाई में महंत फूलडोलदास, महंत सच्चिदानन्द, महंत सुन्दरदास के सानिध्य में गुरुकुल स्थित काठिया आश्रम से संत महंतों ने नगर में भव्य शोभायात्रा निकाली। शोभायात्रा के साथ संतों ने कुंभ क्षेत्र में प्रवेश किया। शोभायात्रा का भक्तों ने जगह-जगह पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। शोभायात्रा गुरुकुल मार्ग स्थित काठिया बाबा आश्रम से शुरू होकर किशोरपुरा, विद्यापीठ, बांकेबिहारी बाजार, अठखम्बा, चुुगी चौराहा होते हुए कुंभ मेला क्षेत्र में पहुंची।
सेवाकुंज से राधा श्याम सुंदर मंदिर से शोभायात्रा निकाली गई। इस शोभायात्रा ने नगर में भ्रमण करते हुए कुंभ मेला में प्रवेश किया। शोभायात्रा में शामिल महिला श्रद्धालु थिरकते हुए चल रही थीं।
कुंभ मेला में करीब 250 शिविर लगेंगे
यूनिक समय, वृंदावन। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष हरिशंकर दास नागा ने कहा कि वृंदावन कुंभ में वैष्णव संत महंतों के करीब 250 खालसा यानि शिविर लगाए जा रहे हैं। इसमें सभी वैष्णवजन देश ही नहीं विदेशों से भी इस महापर्व का दर्शन और भक्ति का आनन्द लेने के लिए आते हैं।
वृंदावन का कुंभ सभी कुंभों से बड़ा
यूनिक समय, वृंदावन। महाराज केशवानंद ने कुंभ के बारे में बताया कि यह कुंभ सभी कुम्भों से बड़ा है क्योंकि जब मन्दराचल पर्वत के मंथन से अमृत कलश निकला तो गरुड़ जी अमृत कलश को लेकर पहले वृंदावन आये। इसका साक्षात प्रमाण काली दह पर कदंब का पेड़ है उस समय यमुना में कालिया नाग का जहर इतना तीव्र था की आसपास के वृक्ष भी जल गए थे लेकिन कदंब का पेड़ आज तक सुरक्षित है। इसके बाद गरुड़ कुंभकलश को लेकर हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन तथा नासिक के ऊपर से गुजरे। इन जगहों पर कुछ बूंदें गिर गई इस कारण यहां भी कुंभ की प्रक्रिया अपनाई जाती है
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