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ब्रज के राजा बलदाऊ ने भक्तों के साथ खेली होली

by यूनिक समय • February 16, 2021
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ब्रज के राजा के साथ माता-रेवती के भव्य श्रृंगार के दर्शन
चंद्र प्रकाश पांडेय
यूनिक समय, मथुरा। समूचे ब्रज सहित ब्रज के राजा की नगरी दाऊजी में भी 45 दिनी होली महोत्सव की शुरूआत बसंत ऋतु से हो गयी है। ढांडा गढ़ने के साथ-साथ वसंत के अवसर पर भक्तों ने अपने ब्रज के राजा के साथ गुलाल की होली खेली।

कहते हैं कि बड़े भागन ते जे फागुन आयो…होली खेल ले सखी हमारी, रसिया को नार बनाओ री, रसिया को… आदि दिव्य होली के समुधुर गीतों पर होली का भव्य आनंद वंसतऋतु से भक्त लेंगे। वसंत से ब्रज राजा के प्रांगण में प्रतिदिन समाज गायन की शुरूआत हो चुकी है। इसके अलावा गोपी भी मंदिर प्रांगण होली के समुधुर गीतों पर नृत्य गायन करेंगी। इन गोपियों के नृत्य से समूचा बलदेव में होलीमय आनंद में जीवंत हो उठेगा।

प्रतिदिन भव्य श्रृंगार के दर्शन ब्रज राजा अपने भक्तों को देंगे। समाज गायन में ढप, ़ढोलक, ढाल, मजीरा आदि की दिव्य धुन सुनाई देगी। इसी दिव्य धुन पर बाहर से आने वाले श्रद्धालु अपने आपको धन्य समझते हुए अपनी जगह पर ही थिरकने लगते हैं। ब्रज के राजा के साथ गुलाल की होली खेलकर तो बाहरी श्रद्धालु मोबाइल में अपने उस पल को कैद करने से बिल्कुल भी नहीं हिचकते। मंदिर के सेवायत यानि पांडेय समाज के लोग भी बाहरी श्रद्धालुओं को 100-100 वर्ष वसंत को देखने का आशीर्वाद देते हैं।

होली के कार्यक्रमों पर एक नजर
16 मार्च- रमणरेती आश्रण में रंग गुलाल की होली
22 मार्च- बरसाना में लड्डू की होली
23 मार्च- बरसाना में लठमार होली
24 मार्च- नंदगांव में लठमार होली
25 मार्च- श्रीकृष्ण जन्मस्थान में लठमार होली, बांकेबिहारी मंदिर में होली
27 मार्च- गोकुल में छड़ी मार होली
28 मार्च- होलिका दहन
29 मार्च- रंगो वाली होली
29 मार्च- बलदाऊजी के प्रांगण में गोप-गोपिकाओं का नृत्य
30 मार्च को बलदाऊजी का हुंरगा, मंदिर प्रांगण में

होली पर इसे महाप्रसादी के रूप में देखते हैं श्रद्धालु
पेड़े प्रसिद्ध हैं मथुरा जी के, गाय प्रसिद्ध हैं ब्रजमंडल की, डाल प्रसिद्ध है कदम की, पंख प्रसिद्ध है मोर का, लाल प्रसिद्ध है नन्द का, और होली? होली प्रसिद्ध है बरसाने की। बरसाने की लट्ठमार होली देखने दूर-दूर से लोग आते है। होली से पूर्व की एकादशी को नन्द ग्राम के गोप ढालें लेकर बरसाने आते हैं। ऐसे ही मथुरा में दाऊजी होली लट्ठ के स्थान पर कपड़े के कोड़े से खेली जाती है और भंग की रंग में गोप गोपकाओं के कोडे़ खाते ही रहते हैं।ं

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