
यूनिक समय, नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने बुधवार को नागपुर में अपना शताब्दी वर्ष मनाते हुए विजयादशमी उत्सव मनाया। इस अवसर पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक विशेष भाषण दिया, जिसमें उन्होंने देश के सामने की चुनौतियों और संघ के ‘राष्ट्र प्रथम’ के संदेश को रेखांकित किया।
बलिदान और जयंती का स्मरण
उन्होंने श्री गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान के साढ़े तीन सौ वर्ष पूरे होने का उल्लेख किया, जिन्होंने अत्याचार और सांप्रदायिक भेदभाव से समाज को मुक्त कराने के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
आज, 2 अक्टूबर को, उन्होंने महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम में अविस्मरणीय योगदान और लाल बहादुर शास्त्री के देश के लिए दिए गए विचारों को याद किया।
सीमा पार आतंकवाद और राष्ट्रीय एकता
मोहन भागवत ने 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले का जिक्र किया, जहां 26 भारतीय यात्रियों की उनकी धार्मिक पहचान पूछ कर हत्या कर दी गई थी। उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने मई में इस हमले का पुरजोर उत्तर दिया। इस पूरे घटनाक्रम में उन्होंने देश के नेतृत्व की दृढ़ता, सेना के पराक्रम के साथ-साथ समाज की दृढ़ता और एकता के सुखद दृश्य को सराहा।
टैरिफ नीति और आत्मनिर्भरता
संघ प्रमुख ने अमेरिका द्वारा लागू की गई नई टैरिफ नीति का उल्लेख किया और कहा कि दुनिया परस्पर निर्भरता पर चलती है, लेकिन यह निर्भरता मजबूरी में नहीं बदलनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमें स्वदेशी पर निर्भर रहने और आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। हमें अपने सभी मित्र देशों के साथ राजनयिक संबंध बनाए रखने चाहिए, जो हमारी इच्छा से और बिना किसी मजबूरी के हों।
हिमालय की सुरक्षा और विकास पर पुनर्विचार
मोहन भागवत ने प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भूस्खलन और लगातार बारिश पिछले 3-4 सालों से आम हो गई है। हिमालय को “हमारी सुरक्षा दीवार और पूरे दक्षिण एशिया के लिए जल का स्रोत” बताते हुए उन्होंने कहा कि यदि विकास के मौजूदा तरीके इन आपदाओं को बढ़ावा देते हैं, तो हमें अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना होगा। उन्होंने कहा कि हिमालय की वर्तमान स्थिति खतरे की घंटी बजा रही है।
धर्म का मार्ग और एकता
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत को अपनी समग्र व एकात्म दृष्टि के आधार पर अपना विकास पथ बनाकर, विश्व के सामने एक यशस्वी उदाहरण रखना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अर्थ और काम के पीछे अंधी होकर भाग रही दुनिया को पूजा व रीति रिवाजों के परे, सबको जोड़ने वाले, सबको साथ में लेकर चलने वाले, सबकी एक साथ उन्नति करने वाले धर्म का मार्ग दिखाना ही होगा।
संघ और समाज की बढ़ती भागीदारी
सरसंघचालक ने कहा कि देश में, खासकर नई पीढ़ी में, देशभक्ति की भावना और संस्कृति के प्रति आस्था निरंतर बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि समाज में चल रही विविध संस्थाएं और व्यक्ति अभावग्रस्त वर्गों की नि:स्वार्थ सेवा के लिए आगे आ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संघ के स्वयंसेवकों का अनुभव है कि संघ और समाज के कार्यों में प्रत्यक्ष सहभागी होने की इच्छा समाज में बढ़ रही है।
पड़ोसी देशों में उथल-पुथल पर चिंता
मोहन भागवत ने पड़ोसी देशों में मची उथल-पुथल पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में जन-आक्रोश के हिंसक उद्रेक से हुए सत्ता परिवर्तन का जिक्र किया और कहा कि यह हमारे लिए चिंताजनक है। उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया में और अपने देश में भी इस प्रकार के उपद्रवों को चाहने वाली शक्तियां सक्रिय हैं।
अंत में, उन्होंने प्रयागराज में संपन्न महाकुंभ का जिक्र किया, जिसने उत्तम व्यवस्थापन के साथ जागतिक विक्रम स्थापित किया और पूरे भारत में श्रद्धा व एकता की प्रचण्ड लहर जगाई।
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