यूनिक समय, नई दिल्ली। नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में जोधपुर जेल में सजा काट रहे आसाराम बापू को राजस्थान हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ की डिवीजन बेंच ने इस बहुचर्चित प्रकरण में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा आसाराम को दी गई आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा को पूरी तरह से बरकरार रखा है। वर्तमान में स्वास्थ्य कारणों या अन्य आधार पर पैरोल पर जेल से बाहर चल रहे आसाराम को अदालत ने सख्त निर्देश जारी करते हुए तुरंत सरेंडर करने का आदेश दिया है, जिससे अब उनका वापस जेल जाना पूरी तरह तय हो गया है। तकनीकी बारीकियों के बाद बदला केस का स्वरूप जोधपुर पीठ की डिवीजन बेंच ने इस बेहद संवेदनशील और हाई-प्रोफाइल मामले में अपीलों पर सुनवाई करते हुए तकनीकी और कानूनी बारीकियों को गहराई से खंगाला। साक्ष्यों की समीक्षा के बाद अदालत ने केस में कुछ बेहद चौंकाने वाले बदलाव किए हैं। हाईकोर्ट ने आसाराम बापू समेत तीनों आरोपियों की अपीलों पर फैसला सुनाते हुए उन्हें सामूहिक दुष्कर्म यानी गैंगरेप (धारा 376-D) के आरोप से पूरी तरह बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर सामूहिक रूप से गैंगरेप का अपराध कानूनी रूप से साबित नहीं होता है। इसके साथ ही कोर्ट ने मामले से आपराधिक साजिश (धारा 120B) और समान आशय (धारा 34) के आरोपों को भी पूरी तरह से हटा दिया है। सह-आरोपियों को मिली बड़ी राहत हाईकोर्ट के इस फैसले से अगर किसी को सबसे बड़ी और वास्तविक राहत मिली है, तो वे हैं इस केस के सह-आरोपी शरद और शिल्पी। निचली अदालत ने इन दोनों को आसाराम का मददगार और इस पूरे अपराध में बराबर का भागीदार मानते हुए सजा सुनाई थी। हालांकि, माननीय हाईकोर्ट ने पाया कि जब मामले में सामूहिक साजिश और गैंगरेप की धाराएं ही कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं हैं, तो सह-आरोपियों की संलिप्तता स्वतः समाप्त हो जाती है। इसी आधार पर कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए शरद और शिल्पी को सभी आरोपों से पूरी तरह दोषमुक्त (बरी) करने के आदेश जारी कर दिए। पॉक्सो एक्ट का शिकंजा बरकरार सामूहिक अपराध की धाराएं हटने और सह-आरोपियों की ससम्मान रिहाई के बाद आसाराम के समर्थकों में जो बड़ी उम्मीद जगी थी, उस पर हाईकोर्ट ने अपने अंतिम रुख से तुरंत पानी फेर दिया। अदालत ने दो टूक शब्दों में साफ किया कि भले ही तकनीकी तौर पर सामूहिक अपराध और साजिश की धाराएं हटा दी गई हों, लेकिन मुख्य आरोपी आसाराम बापू पर लगे व्यक्तिगत आरोप बेहद गंभीर, अक्षम्य और अकाट्य हैं। अदालत ने नाबालिग पीड़िता के साथ किए गए कृत्य के लिए पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) और दुष्कर्म की अन्य गंभीर धाराओं के तहत निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के फैसले को शत-प्रतिशत सही और न्यायसंगत माना है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि इस जघन्य कृत्य के लिए निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा में किसी भी प्रकार की ढील, नरमी या बदलाव नहीं किया जाएगा। अदालत का कड़ा रुख वर्तमान में पैरोल की अवधि का लाभ उठा रहे आसाराम बापू के वकीलों ने सजा कम करने या राहत देने के लिए कोर्ट के समक्ष कई दलीलें पेश कीं, लेकिन हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने गंभीर रुख अपनाते हुए सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि आसाराम बिना किसी देरी के तुरंत कानून के समक्ष सरेंडर करें और उन्हें वापस जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाए। कुल मिलाकर देखा जाए तो इस बड़े फैसले से भले ही केस से 'गैंगरेप' और 'साजिश' जैसे बड़े विधिक शब्द हट गए हों, लेकिन मुख्य सजा के मोर्चे पर आसाराम को रत्ती भर भी राहत नहीं मिली है। उनकी उम्रकैद की सजा जस की तस कायम रहने के कारण अब उनकी बाकी की पूरी जिंदगी जेल की चहारदीवारी के भीतर ही कटेगी। नोट: यूनिक समय को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। यह भी पढ़े: Mathura News: ठाकुर द्वारकाधीश मंदिर में 27 मई को मनेगा विशेष होली महोत्सव; भक्तों संग होली खेलेंगे राजाधिराज [web_stories title="true" excerpt="false" author="false" date="false" archive_link="true" archive_link_label="" circle_size="150" sharp_corners="false" image_alignment="left" number_of_columns="1" number_of_stories="8" order="DESC" orderby="post_date" view="carousel" /]