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अचला सप्तमी व्रत 18 फरवरी को, भगवान सूर्यदेव भक्तों को देते हैं अरोग्यता का आशीर्वाद

by यूनिक समय • February 11, 2021
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यूनिक समय, मथुरा। माघ मास की शुक्ल पक्ष की अचला सप्तमी को सभी सप्तमी तिथियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। शास्त्रों में अचला सप्तमी का विशेष महत्व होता है। अचला सप्तमी को रथ सप्तमी, भानु सप्तमी और अरोग्य सप्तमी के नाम से भी जानते हैं। इस साल अचला सप्तमी 19 फरवरी (शुक्रवार) को है। मान्यता है कि इस पापों से मुक्ति पाने के लिए रथारूढ़ सूर्यनारायण की पूजा की जाती है। कहते हैं कि इस दिन सूर्य देव ने सबसे पहले विश्व को प्रकाशित किया था। इसे सूर्य जयंती के नाम से भी जानते हैं। अचला सप्तमी के दिन सूर्यदेव की अराधना का अक्षय फल मिलता है। भगवान सूर्य भक्तों को सुख-समृद्धि और अरोग्यता का आशीर्वाद देते हैं।

भविष्य पुराण में इस सप्तमी की बड़ी महिमा वर्णित है। भविष्य पुराण के अनुसार, यह व्रत सौभाग्य, सुंदरता और उत्तम संतान का वरदान मिलता है। कहते हैं कि अचला सप्तमी के दिन जो व्यक्ति सूर्य देव की पूजा करके सिर्फ मीठा भोजन या फलाहार करता है, उसे पूरे साल सूर्य व्रत और पूजा का पुण्य मिलता है।

अचला सप्तमी पूजा विधि
रथ सप्तमी के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करके उगते हुए सूर्य का दर्शन और उन्हें जल अर्पित करें। सूर्य की किरणों को लाल रोली, लाल पुष्प मिलाकर अघ्र्य दें। सूर्य को जल देने के बाद आसन में बैठक्र पूर्व दिशा में मुख करके ‘एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणाध्र्य दिवाकर।।’ मंत्र का जाप करें।

अचला सप्तमी को लेकर प्रचलित कथा
कथा है कि एक गणिका इन्दुमती ने वशिष्ठ मुनि के पास जाकर मुक्ति पाने का उपाय पूछा। मुनि ने कहा, ‘माघ मास की सप्तमी को अचला सप्तमी का व्रत करो।’ गणिका ने मुनि के बताए अनुसार व्रत किया। इससे मिले पुण्य से जब उसने देह त्यागी, तब उसे इन्द्र ने अप्सराओं की नायिका बना दिया। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब को अपने शारीरिक बल और सौष्ठव पर बहुत अधिक अभिमान हो गया था। शाम्ब ने अपने इसी अभिमानवश होकर दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। दुर्वासा ऋषि को शाम्ब की धृष्ठता के कारण क्रोध आ गया, जिसके पश्चात उन्होंने को शाम्ब को कुष्ठ हो जाने का श्राप दे दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र शाम्ब से भगवान सूर्य नारायण की उपासना करने के लिए कहा। शाम्ब ने भगवान कृष्ण की आज्ञा मानकर सूर्य भगवान की आराधना करनी आरम्भ कर दी। जिसके फलस्वरूप सूर्य नारायण की कृपा से उन्हें अपने कुष्ठ रोग से मुक्ति प्राप्त हो गई।

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