यूनिक समय, नई दिल्ली। बॉलीवुड के दिग्गज डायरेक्टर डेविड धवन के निर्देशन में बनी और एक्टर वरुण धवन स्टारर मल्टीस्टारर फिल्म 'है जवानी तो इश्क होना है' आज यानी 5 जून 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। वरुण धवन बीते काफी समय से अपनी इस फिल्म को लेकर सुर्खियों में बने हुए थे। डेविड धवन हमेशा से ही अपनी फिल्मों के एक खास कॉमिक टेम्पलेट और 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' के लिए जाने जाते हैं। उनकी फिल्में दर्शकों को बिना दिमाग लगाए दो घंटे तक मस्त टाइम पास कराने का दम रखती हैं। ऐसे में इस फिल्म को लेकर भी दर्शकों और क्रिटिक्स के बीच भारी उत्सुकता थी। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्या वरुण धवन की यह फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतर पाई है। क्या है फिल्म की कहानी? फिल्म की कहानी मुख्य रूप से जस (वरुण धवन) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक बेहद खुशमिजाज और जोशीला इंसान है। जस की पत्नी बानी (मृणाल ठाकुर) उससे बेहद प्यार करती है, लेकिन दोनों के बीच सोच और प्राथमिकताओं का बड़ा अंतर है। जस जल्द से जल्द पिता बनना चाहता है, जबकि बानी उसके इस लगातार बढ़ते दबाव और जल्दबाजी से बेहद परेशान हो चुकी है। दोनों के बीच बात इतनी ज्यादा बिगड़ जाती है कि मामला कोर्ट-कचहरी और तलाक तक पहुंच जाता है। इस टूटे हुए रिश्ते और मानसिक तनाव से बाहर निकलने की कोशिश के दौरान जस की जिंदगी में प्रीत (पूजा हेगड़े) की एंट्री होती है। दोनों एक-दूसरे के करीब आते हैं और जस को लगता है कि उसकी जिंदगी अब फिर से पटरी पर लौट रही है। लेकिन डेविड धवन की फिल्मों में ट्विस्ट न हो, ऐसा भला कैसे हो सकता है। असली गड़बड़ और रायता तब फैलता है जब बानी और प्रीत दोनों एक साथ गर्भवती (प्रेग्नेंट) हो जाती हैं और दोनों बच्चों का पिता जस ही निकलता है। इसके बाद कहानी में प्रीत का भाई (जिमी शेरगिल), जो एक बेहद दबंग आदमी है, उसकी एंट्री होती है। इसके बाद पूरी फिल्म में झूठ, सच छिपाने, गलतफहमियों और भागदौड़ का ऐसा सिलसिला शुरू होता है जो कहानी को दिलचस्प बनाने के साथ-साथ बेहद कन्फ्यूज़िंग भी कर देता है। वरुण धवन ने फिर जीता दिल अभिनय की बात करें तो वरुण धवन इस पूरी फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी (ताकत) साबित हुए हैं। फिल्म में भागते, छिपते, लगातार झूठ बोलते और फिर अपने ही झूठ के जाल में बुरी तरह फंसते हुए जस के किरदार को उन्होंने पूरी एनर्जी और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग के साथ निभाया है। उन्हें देखकर दर्शकों को उनके पुराने कॉमिक किरदारों की याद ताजा हो जाती है। जब भी स्क्रीनप्ले धीमा पड़ता है, वरुण अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से उसे संभाल लेते हैं। अभिनेत्री मृणाल ठाकुर के हिस्से में ज्यादा कुछ नहीं आया है, लेकिन बानी के रूप में उन्होंने अपने किरदार को पूरी गरिमा के साथ निभाया है और वह पूरी फिल्म में सबसे समझदार इंसान नजर आती हैं। वहीं पूजा हेगड़े स्क्रीन पर बेहद खूबसूरत और शानदार लगी हैं, वरुण के साथ उनकी केमिस्ट्री भी ठीक-ठाक है, हालांकि स्क्रीनप्ले उन्हें सिर्फ कहानी की उलझन बढ़ाने वाले किरदार तक ही सीमित रखता है। मनीष पॉल जब भी स्क्रीन पर आते हैं, दर्शकों को हंसने की पुख्ता वजह दे जाते हैं, लेकिन उन्हें स्क्रीन टाइम काफी कम मिला है जो खटकता है। जिमी शेरगिल ने अपने चिर-परिचित सीरियस और दबंग अंदाज में बेहतरीन काम किया है। इसके अलावा मौनी रॉय, चंकी पांडे, आयशा रजा मिश्रा, दिग्गज अभिनेता राकेश बेदी और राजपाल यादव ने भी अपने छोटे लेकिन मजेदार किरदारों से फिल्म में अच्छा कॉमिक माहौल बनाने का प्रयास किया है। कमजोर कड़ियां डायरेक्शन के मामले में डेविड धवन अपने पुराने रंग में जरूर नजर आते हैं और उन्हें बखूबी पता है कि दर्शक उनके पास गंभीर सिनेमा देखने नहीं, बल्कि लॉजिक छोड़कर सिर्फ हंसने आते हैं। फिल्म का दूसरा हिस्सा (इंटरवल के बाद) काफी रफ्तार पकड़ता है और कुछ परिस्थितियां सचमुच दर्शकों को पेट पकड़कर हंसने पर मजबूर कर देती हैं। राइटर फरहाद सामजी के लिखे कुछ वन-लाइनर्स और डायलॉग्स काफी मजेदार हैं, जिन्हें वरुण ने अपने कॉमिक पंच से और शानदार बना दिया है। लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका पहला हाफ और बेहद ढीला संपादन (Editing) है। फिल्म का पहला हिस्सा बहुत धीमा है और कई दृश्य ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें सिर्फ समय बढ़ाने के लिए ठूंसा गया हो। लगभग 2 घंटे 10 मिनट से ज्यादा की यह फिल्म कई जगह अपनी ही रफ्तार की दुश्मन बन जाती है। इसके अलावा, आज के आधुनिक दौर में टॉयलेट ह्यूमर, बॉडी शेमिंग (शरीर का मजाक उड़ाने वाले चुटकुले) और पुराने जमाने के घिसे-पिटे हास्य दृश्य बेहद बासी और अखरने वाले महसूस होते हैं। तकनीकी तौर पर फिल्म रंगीन और भव्य है; लंदन की खूबसूरत लोकेशंस, चमकदार फ्रेम और बड़े सेट्स आंखों को अच्छे लगते हैं। संगीत ने किया निराश फिल्म का म्यूजिक इसकी सबसे कमजोर कड़ियों में से एक साबित हुआ है। कोई भी नया गाना ऐसा नहीं है जो सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद दर्शकों की जुबान पर टिक सके या लंबे समय तक याद रहे। फिल्म में सलमान खान की पुरानी फिल्म का गाना 'चुनरी चुनरी' रीमेक के तौर पर रखा गया है, जो दर्शकों पर थोड़ा असर छोड़ता है, लेकिन उसकी वजह भी नया म्यूजिक नहीं बल्कि पुरानी यादें (नॉस्टैल्जिया) हैं। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की एनर्जी को बनाए रखने की पूरी कोशिश करता है, लेकिन वह भी कोई बड़ा चमत्कार नहीं कर पाता। कुल मिलाकर, 'है जवानी तो इश्क होना है' एक ऐसी टिपिकल डेविड धवन स्टाइल फिल्म है जो अपने दर्शकों से किसी भी तरह के लॉजिक की उम्मीद नहीं करती। यह पूरी तरह से अफरा-तफरी, पागलपन और वरुण धवन की कॉमिक टाइमिंग पर टिकी हुई है। अगर आप गंभीर सिनेमा, मजबूत कहानी या किसी नई सोच की उम्मीद लेकर थियेटर जा रहे हैं, तो आपको भारी निराशा हाथ लगेगी। लेकिन अगर आप ऑफिस और घर की रोजमर्रा की किटकिट से परेशान हैं, दिमाग को थोड़ी देर आराम देना चाहते हैं और बिना लॉजिक ढूंढे केवल टाइम पास करना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको कुछ जगह जरूर हंसाएगी। नोट: यूनिक समय को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। यह भी पढ़े: Breaking: BJP से इस्तीफा देने के बाद पूर्व IPS के. अन्नामलाई ने किया नई पार्टी बनाने का एलान; 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