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इत्र नगरी कन्नौज से आज अखिलेश करेंगे नामांकन, मुलायम, डिंपल और खुद अखिलेश भी जीत चुके हैं इस सीट से, जानिए यहां की पॉलिटिकल हिस्ट्

by Gunja Singh • April 25, 2024
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कन्नौज में आज (25 अप्रैल) नामांकन का आखिरी दिन है. उसके ठीक पहले सपा ने बड़ा फैसला लिया है और खुद पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव को उम्मीदवार बनाया है. अब यह साफ हो गया है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उम्मीदवार होंगे और दमखम दिखाएंगे. इस बार वो कन्नौज से चुनाव लड़ने जा रहे है. 2019 में अखिलेश ने आजमगढ़ से चुनाव लड़ा था. अखिलेश अभी मैनपुरी जिले की करहल सीट से विधायक हैं. फिलहाल इत्रनगरी के नाम से मशहूर कन्नौज सीट एक बार फिर बीजेपी और और समाजवादियों के लिए नाक का सवाल बन गई है. अखिलेश के सामने बीजेपी के सुब्रत पाठक होंगे. उन्होंने 2019 के चुनाव में अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव को हराया था.

कन्नौज सदियों से इत्र उद्योग में अग्रणी रहा है और इत्र ही यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. प्राचीन शहर की संकरी गलियां इत्र और इत्र की दुकानों का केंद… हैं. इस सीट से अखिलेश पहले भी लोकसभा सांसद रहे हैं. वे 2012 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने से पहले तीन बार कन्नौज से सांसद रहे. या यूं कह लीजिए कि अखिलेश ने साल 2000 में अपनी सियासी पारी का आगाज इसी सीट से किया था. अखिलेश ने पिता मुलायम सिंह के इस्तीफे के बाद खाली हुई इस सीट से उपचुनाव लड़ा था…और जीत हासिल की थी. 

‘जब मुलायम ने अखिलेश का हाथ पकड़कर कहा था…’

दरअसल, मुलायम ने 1999 में कन्नौज और संभल सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता था. बाद में उन्होंने कन्नौज से इस्तीफा दे दिया और बेटे अखिलेश के लिए यह सीट छोड़ दी. मुलायम ने खुद चुनावी मंच पर अखिलेश का हाथ पकड़कर कहा था कि बेटा छोड़ जा रहूं, सांसद बना देना! उपचुनाव में जीत के अखिलेश 2004 और 2009 में भी कन्नौज से सांसद चुने गए. 2012 में अखिलेश ने सीएम बनने पर कन्नौज लोकसभा सांसद के रूप में इस्तीफा दिया. तब तक यह सीट मुलायम मुलायम परिवार की गढ़ गई थी.

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‘कन्नौज से डिंपल यादव भी दो बार सांसद रहीं’

उपचुनाव में अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव ने भी जीत हासिल की.अब उसके बाद 2014 के चुनाव में मोदी लहर में भी डिंपल यादव कन्नौज से सांसद चुनी गईं. हालांकि, 2019 के चुनाव में डिंपल और यादव परिवार को बड़ा झटका लगा और सप..डिंपल और यादव परिवार को बड़ा झटका लगा और सपा का गढ़ कहे जाने लगी इत्र नगरी हाथ से छिटक गई. सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन होने के बावजूद डिंपल को सफलता नहीं…
मिली और यहां बीजेपी के स्थानीय नेता सुब्रत पाठक ने जीत हासिल की. अब 2024 में अखिलेश के फिर मैदान में आने से कन्नौज बीजेपी और सपा के बीच करीबी मुकाबले की ओर बढ़ रहा है. 

सपा को क्यों बदलना पड़ा उम्मीदवार?

सपा ने तीन दिन पहले ही इस सीट पर तेज प्रताप यादव को उम्मीदवार बनाया था. हालांकि, स्थानीय नेताओं के स्वीकार नहीं करने से पार्टी को अपना फैसला बदलना पड़…पार्टी वर्कर्स कहना था कि तेजप्रताप भले ही अखिलेश यादव के भतीजे हैं, लेकिन कन्नौज के लिए वे एकदम नए चेहरे हैं. यह सीट 2019 तक पार्टी का गढ़ रही है. ऐसे में बीजेपी को हराने के लिए मजबूत चेहरे की जरूरत थी और अखिलेश से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता है. अखिलेश यहां के लिए लंबे समय तक संभावित उम्मीदवार… भी रहे हैं.

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अखिलेश ने 2022 में ही दे दिए थे संकेत…

नवंबर 2022 में ही अखिलेश ने कन्नौज से चुनाव लड़ने का संकेत दे दिया था. मीडिया से बातचीत में जब अखिलेश से पूछा गया कि क्या वो कन्नौज से सपा के उम्मीदवा… होंगे तो उन्होंने कहा, चुनाव लड़ना हमारा काम है. मैं वहीं से लड़ूंगा, जहां से मैंने अपना पहला चुनाव लड़ा था. उस समय अखिलेश के इस बयान के मायने निकाले … गए और पार्टी कैडर में बड़ा संदेश देने की कोशिश से जोड़ा गया. लोकसभा चुनाव में सपा के लिए मैनपुरी, कन्नौज, इटावा, एटा, संभल, फिरोजाबाद, बदायूं और आजमगढ..फोकस में हैं. अखिलेश यादव नहीं चाहते कि पार्टी कन्नौज से हारे, जहां उन्होंने सीएम के रूप में विभिन्न विकास परियोजनाओं की शुरुआत की थी. पार्टी नेताओं का कहना है कि कन्नौज से अखिलेश की उम्मीदवारी से कार्यकर्ताओं में जोश भरने में मदद मिलेगी. तत्कालीन सपा सरकार ने कन्नौज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन बीजेपी शासन में इस क्षेत्र के लिए कुछ नहीं किया है. लेकिन बीजेपी शासन में इस क्षेत्र के लिए कुछ नहीं किया है.

कन्नौज सीट का चुनावी समीकरण क्या है?

कन्नौज लोकसभा सीट में पांच विधान सभा क्षेत्र आते हैं. इनमें से चार विधानसभा सीटों पर बीजेपी का कब्जा है. कन्नौज में करीब 16 फीसदी मुस्लिम और करीब 16 प्रतिशत यादव आबादी है. जबकि 15 प्रतिशत ब्राह्मण और 10 प्रतिशत राजपूत समाज है… इसके अलावा 39 फीसदी अन्य समुदाय के लोग रहते हैं. इसमें ज्यादा संख्या दलितों की है.

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