Fri, Jun 5th, 2026
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CDS जनरल अनिल चौहान का ‘सुरक्षा मंत्र’; बोले “सिर्फ सीमाओं की रक्षा नहीं, देश के लोग और विचारधारा बचाना भी है राष्ट्रीय सुरक्षा”

by Tarun Bhardwaj • January 23, 2026
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यूनिक समय, नई दिल्ली। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीDS) जनरल अनिल चौहान ने राष्ट्रीय सुरक्षा की आधुनिक चुनौतियों और इसके गहरे अर्थों को लेकर एक नया दृष्टिकोण पेश किया है। दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अपनी पुस्तक के माध्यम से सुरक्षा के तीन प्रमुख स्तंभों को स्पष्ट किया और इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा को केवल सैन्य शक्ति के दायरे में सीमित करके देखना एक भूल होगी।

सुरक्षा के ‘तीन घेरे’

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने आधुनिक भारत की रणनीतिक सोच को स्पष्ट करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा को एक-दूसरे से जुड़े तीन वृत्तों के माध्यम से समझाया है, जिसमें सबसे बाहरी घेरा ‘समग्र सुरक्षा’ का है जो कूटनीति, अर्थव्यवस्था और आंतरिक स्थिरता जैसे व्यापक आयामों को समेटे हुए है। इसके बाद मध्य घेरा ‘देश की रक्षा’ पर केंद्रित है जो सक्रिय खतरों से बचाव और सामरिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जबकि सबसे भीतरी और बुनियादी घेरा ‘सैन्य क्षमता’ को दर्शाता है जिसमें सेना की युद्धक तैयारी और हथियारों की शक्ति शामिल है। जनरल ने यह स्पष्ट किया कि ये तीनों घेरे पूरी तरह एक-दूसरे पर निर्भर हैं और इनकी आपसी मजबूती ही मिलकर राष्ट्र को सुरक्षित बनाती है।

आजाद हिंद फौज

भारतीय सैन्य इतिहास पर चर्चा करते हुए सीडीएस ने एक महत्वपूर्ण बदलाव का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि दशकों तक हमें ब्रिटिश लेखकों द्वारा लिखा गया सैन्य इतिहास पढ़ाया गया, जिसमें भारतीय दृष्टिकोण की कमी थी। उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि आईएनए ने जो नुकसान और बलिदान सहा, वह सैन्य इतिहास में सबसे अधिक है।

उन्होंने आईएनए को ‘विविधता में एकता’ का सबसे बड़ा प्रतीक बताया, क्योंकि इसमें धर्म, जाति, क्षेत्र और लिंग के भेदभाव के बिना हर भारतीय कंधे से कंधा मिलाकर लड़ा था।

बदल गई राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा

जनरल चौहान ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि आधुनिक दौर में सुरक्षा का अर्थ केवल भौगोलिक सरहदों पर पहरा देने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आज राष्ट्रीय सुरक्षा के तीन अभिन्न हिस्से हैं—देश की भौगोलिक भूमि, वहां के नागरिक और राष्ट्र की अपनी विचारधारा। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया कि जब तक देश की विचारधारा और उसके लोग पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, तब तक केवल सीमाओं की रक्षा को पूर्ण सुरक्षा नहीं माना जा सकता।

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