
यूनिक समय, नई दिल्ली। अमेरिकी सेना ने कैरिबियन सागर में मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ अपने ‘काइनेटिक’ अभियान को और तेज करते हुए एक संदिग्ध ड्रग बोट को निशाना बनाया है। इस घातक हमले में तीन कथित तस्करों के मारे जाने की पुष्टि हुई है। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में शुरू हुए इस आक्रामक अभियान ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक नई बहस छेड़ दी है, जहाँ तस्करी रोकने के नाम पर सीधे सैन्य बल का प्रयोग किया जा रहा है।
विस्फोट के साथ आग के गोले में बदली नाव
अमेरिकी साउदर्न कमांड द्वारा जारी किए गए एक वीडियो में देखा जा सकता है कि एक नाव कैरिबियन सागर के ज्ञात नारको-तस्करी मार्ग पर सामान्य गति से आगे बढ़ रही थी। तभी अमेरिकी सेना की ओर से अचानक ड्रग बोट पर सटीक हमला किया गया। हमले के तुरंत बाद ड्रग बोट आग की लपटों में घिर गई और एक भीषण विस्फोट के साथ पानी में समा गई। साउदर्न कमांड ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि यह नाव नशीले पदार्थों के अभियानों में सक्रिय रूप से शामिल थी।
ट्रंप प्रशासन का ‘नारको-वॉर’ और बढ़ते आंकड़े
सितंबर 2025 से शुरू हुए इस कड़े रुख के बाद से अब तक के आंकड़े वास्तव में चौंकाने वाले हैं, क्योंकि इस ताज़ा हमले के साथ ही ट्रंप प्रशासन के इन सैन्य ऑपरेशनों में मरने वालों की कुल संख्या अब 133 तक पहुँच गई है।
अमेरिकी सेना ने कैरिबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर के क्षेत्रों में अब तक कम से कम 38 घातक सैन्य हमले किए हैं, जो इस क्षेत्र में बढ़ती आक्रामकता को दर्शाते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने इन कार्रवाइयों को उचित ठहराते हुए खुले तौर पर घोषणा की है कि अमेरिका लैटिन अमेरिकी कार्टेलों के साथ ‘सशस्त्र संघर्ष’ (Armed Conflict) की स्थिति में है और वे इन मौतों को देश में ड्रग्स के प्रवाह को रोकने के लिए एक आवश्यक और कड़ा कदम मान रहे हैं।
रक्षा मंत्री का दावा और सबूतों का अभाव
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने हाल ही में दावा किया था कि अमेरिकी सेना के इन “अत्यधिक प्रभावी” हमलों के डर से शीर्ष कार्टेलों ने अपने अभियानों को अनिश्चित काल के लिए रोक दिया है। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों और विशेषज्ञों ने इस पर सवाल उठाए हैं क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने इन “नारको-आतंकवादियों” को सीधे मौके पर ही खत्म करने के दावों के समर्थन में अब तक बहुत कम ठोस सबूत पेश किए हैं।
वैश्विक चिंताएं
बिना किसी मुकदमे या कानूनी प्रक्रिया के संदिग्ध नावों पर इस तरह के घातक हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं। अमेरिका इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बता रहा है, जबकि आलोचक इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का उल्लंघन मान रहे हैं।
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