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Bengal SIR Crisis: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; 50 लाख दावों के निपटारे के लिए अब ‘सिविल जज’ संभालेंगे मोर्चा

by Tarun Bhardwaj • February 24, 2026
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यूनिक समय, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन निरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (24 फरवरी, 2026) को एक बेहद अहम और कड़ा निर्देश दिया है। 28 फरवरी की समयसीमा और लंबित पड़े 50 लाख दावों के बोझ को देखते हुए, अदालत ने अब इस प्रक्रिया में अनुभवी सिविल जजों को भी शामिल करने का आदेश दिया है।

समय कम, काम ज्यादा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचौल की बेंच ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के निरीक्षण कार्य की गंभीरता को एक सटीक गणितीय उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट किया है। अदालत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती 50 लाख लंबित दावों की समयबद्ध जांच करना है, जिसके संदर्भ में बेंच ने तर्क दिया कि यदि 250 जिला और अतिरिक्त जिला जज नियुक्त किए जाएं और प्रत्येक अधिकारी प्रतिदिन 250 मामलों का निपटारा करे, तब भी इस पूरे कार्य को संपन्न करने में 80 दिन का समय लगेगा जबकि समय केवल कुछ ही दिनों का शेष है।

इसी कमी को दूर करने के लिए समाधान के तौर पर अब तीन साल से अधिक अनुभव वाले सिविल जजों को भी इस कार्य में लगाने का निर्देश दिया गया है। इसके अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को यह विशेष अधिकार भी प्रदान किया है कि यदि सिविल जजों की नियुक्ति के बाद भी संख्या अपर्याप्त रहती है, तो वे पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओडिशा के चीफ जस्टिस से न्यायिक अधिकारी उपलब्ध करवाने का अनुरोध कर सकते हैं। यह बेहद महत्वपूर्ण है कि इन बाहरी राज्यों से बुलाए जाने वाले अधिकारियों के ठहरने और परिवहन पर होने वाला समस्त व्यय चुनाव आयोग द्वारा ही वहन किया जाएगा।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि 28 फरवरी को फाइनल लिस्ट का प्रकाशन होना है, लेकिन उसके बाद भी चुनाव आयोग सप्लीमेंट्री (पूरक) लिस्ट जारी कर सकता है। सप्लीमेंट्री लिस्ट में शामिल होने वाले मतदाताओं को भी फाइनल लिस्ट का ही हिस्सा माना जाएगा, ताकि कोई भी पात्र नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित न रहे।

विवाद की जड़

यह पूरा विवाद मुख्य रूप से बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच अधिकारियों की नियुक्ति और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर शुरू हुआ था, जिसमें चुनाव आयोग ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने मतदाता सूची के निरीक्षण के लिए आवश्यक ‘क्लास 2’ के अधिकारी उपलब्ध नहीं कराए।

इस खींचतान के बीच बंगाल सरकार ने आयोग द्वारा दूसरे राज्यों से ‘माइक्रो ऑब्जर्वर’ नियुक्त किए जाने का कड़ा विरोध किया और साथ ही ‘स्पेशल रोल ऑफिसर’ जैसे नए पदों के सृजन पर भी अपनी गहरी आपत्ति दर्ज कराई। अंततः दोनों पक्षों के बीच बढ़ते मतभेदों और विश्वास की कमी को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी कार्यपालिका के बजाय न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) को सौंपने का निर्णय लिया।

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