यूनिक समय, मथुरा। राज्यसभा के बजट सत्र के दौरान सांसद चौधरी तेजवीर सिंह ने निजी स्कूलों द्वारा की जा रही मनमानी फीस वृद्धि और अभिभावकों के आर्थिक शोषण का मुद्दा बेहद प्रखरता से उठाया। सदन का ध्यान इस गंभीर विषय की ओर आकर्षित करते हुए उन्होंने कहा कि आज के दौर में शिक्षा का व्यवसायीकरण मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक बड़ा संकट बन गया है। सांसद ने आरोप लगाया कि कई निजी शिक्षण संस्थान न केवल ट्यूशन फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी कर रहे हैं, बल्कि एडमिशन, एक्टिविटी और ट्रांसपोर्ट जैसे विभिन्न मदों के नाम पर 'हिडन चार्ज' वसूल कर परिवारों की कमर तोड़ रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि शिक्षा इतनी महंगी हो जाएगी, तो 'समान अवसर' का संवैधानिक सिद्धांत पूरी तरह कमजोर पड़ जाएगा, क्योंकि आज कई अभिभावक अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के चक्कर में भारी कर्ज के जाल में फंस रहे हैं। अपने संबोधन के दौरान सांसद तेजवीर सिंह ने जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शिक्षा क्षेत्र में हुए आधुनिक और क्रांतिकारी सुधारों की जमकर सराहना की, वहीं स्थानीय स्तर पर जारी इस "मुनाफाखोरी" की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता भी जताई। उन्होंने सदन के माध्यम से सरकार के समक्ष तीन प्रमुख प्रस्ताव रखे, जिनमें निजी स्कूलों की फीस पर अंकुश लगाने के लिए एक सख्त राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय नीति बनाने की मांग सबसे अहम है। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्कूलों की फीस संरचना में पूर्ण पारदर्शिता होनी चाहिए ताकि कोई भी संस्थान गुप्त तरीके से पैसा न वसूल सके। इसके साथ ही, उन्होंने अभिभावकों की शिकायतों के त्वरित निस्तारण के लिए जिला स्तर पर एक प्रभावी लोकपाल या शिकायत निवारण तंत्र की नियुक्ति पर भी बल दिया। सांसद द्वारा संसद के पटल पर इस जमीनी मुद्दे को उठाए जाने के बाद उनके गृह जनपद मथुरा और वृंदावन के अभिभावकों में खुशी की लहर दौड़ गई है। स्थानीय अभिभावक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने डॉ. तेजवीर सिंह की इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि उन्होंने लाखों परिवारों के दिल की बात को देश की सबसे बड़ी पंचायत में रखा है। मथुरा के लोगों का मानना है कि अब जब यह मामला सीधे राज्यसभा में गूँजा है, तो केंद्र और राज्य सरकारें निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए जल्द ही कोई ठोस कानूनी ढांचा तैयार करेंगी। यह मुद्दा न केवल एक जिले का है, बल्कि पूरे देश के उन मध्यम वर्गीय परिवारों का है जो शिक्षा के बढ़ते खर्चों के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।