यूनिक समय, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस वक्त अपने इतिहास के सबसे भीषण और विनाशकारी राजनीतिक संकट से गुजर रही है। बंगाल से लेकर दिल्ली तक ममता बनर्जी के साम्राज्य में एक साथ हुआ यह बिखराव पार्टी को पूरी तरह टुकड़ों में बांटता नजर आ रहा है। टीएमसी की फायरब्रांड राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने संसद की सदस्यता सहित असम टीएमसी के अध्यक्ष और सभी सांगठनिक पदों से अचानक इस्तीफा देकर ममता खेमे को जमीनी स्तर पर बड़ा झटका दिया है। सुष्मिता देव के जाने के तुरंत बाद दिल्ली के सियासी गलियारों में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब सायानी घोष सहित टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने बगावत का बिगुल फूंकते हुए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंपकर एनडीए (NDA) को समर्थन देने का आधिकारिक ऐलान कर दिया। केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि कोलकाता में भी ममता बनर्जी के पैरों तले जमीन खिसक गई है, जहां टीएमसी विधायक दल में बहुत बड़ी बगावत हो चुकी है। पार्टी के 58 विधायकों ने आलाकमान के आधिकारिक उम्मीदवार शोवनदेब चट्टोपाध्याय को सीधे तौर पर नकारते हुए विपक्ष के नेता के पद के लिए ऋतब्रत बनर्जी का खुलकर समर्थन कर दिया है। बंगाल में विधायक दल और दिल्ली में संसदीय दल में एक साथ हुई इस ऐतिहासिक टूट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के रणनीतिक वजूद पर अब तक का सबसे बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। सुष्मिता देव- "आज मैं एक आजाद महिला हूँ" असम के दिग्गज और प्रभावशाली बंगाली नेता संतोष मोहन देव की बेटी सुष्मिता देव ने बुधवार सुबह राज्यसभा के सभापति (उपराष्ट्रपति) सीपी राधाकृष्णन से मुलाकात कर उन्हें अपना आधिकारिक त्यागपत्र सौंप दिया। इससे पहले ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की प्रमुख रह चुकीं 53 वर्षीय सुष्मिता देव साल 2021 में कांग्रेस का दामन छोड़ टीएमसी में शामिल हुई थीं। इस्तीफा देने के बाद सुष्मिता देव के बयानों और उनकी मुलाकातों ने बंगाल से लेकर असम तक सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा, "आज मैं एक आजाद महिला हूँ। मैं असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा (हिमंता दा) को लंबे समय से जानती हूँ और उनसे केवल एक शिष्टाचार भेंट करने गई थी। मुझे इस बात की जानकारी नहीं है कि कौन क्या कर रहा है, और चूंकि मैं असम से हूँ, इसलिए मैं बंगाल की राजनीति में सीधे तौर पर शामिल नहीं हूँ।" राजनीतिक विश्लेषकों और सूत्रों का दावा है कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से इस मुलाकात के बाद सुष्मिता देव का भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होना लगभग तय माना जा रहा है। गौरतलब है कि सुष्मिता देव इस हफ्ते इस्तीफा देने वाली टीएमसी की दूसरी बड़ी राज्यसभा सांसद हैं। इससे ठीक दो दिन पहले सोमवार को टीएमसी के बेहद वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में लंबे समय तक पार्टी के मुख्य सचेतक रहे सुखेंदु शेखर रॉय ने भी संसद और पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। रॉय ने ममता बनर्जी की 15 साल की सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ अपराध और पूरी तरह फेल हो चुकी कानून-व्यवस्था के गंभीर आरोप लगाए थे। सायानी घोष समेत 20 लोकसभा सांसदों ने खोला मोर्चा संसद के निचले सदन यानी लोकसभा में भी ममता बनर्जी की मुश्किलें तब चरम पर पहुंच गईं, जब जादवपुर से नवनिर्वाचित सांसद और बंगाली फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री सायानी घोष ने पार्टी के अन्य 20 बागी सांसदों के साथ मिलकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र सौंप दिया। इस पत्र के जरिए इन सांसदों ने संसद में टीएमसी से अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है और सामूहिक रूप से केंद्र की बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को अपना खुला समर्थन देने की घोषणा कर दी है। बागी सांसदों के इस गुट ने पत्र में अभिषेक बनर्जी को दरकिनार करते हुए काकोली घोष दस्तीदार को टीएमसी बागी संसदीय दल का नया नेता बनाने की बात कही है। इस पत्र में हस्ताक्षर करने वाले प्रमुख चेहरों में सायानी घोष, अरुप चक्रवर्ती, पार्थ भौमिक, शताब्दी रॉय, जगदीश वसुनिया, काकोली घोष दस्तीदार, प्रसून बनर्जी, कालीपदा सोरेन, शर्मिला सरकार, जून मालिया, वापी हलदर, असित मल और सुवेंदु शेखर रॉय शामिल हैं। क्यों बागी बनीं सायानी घोष? 1993 में कोलकाता में जन्मीं और 2024 के लोकसभा चुनाव में जादवपुर से जीतकर संसद पहुंचने वाली सायानी घोष हमेशा से अपने तीखे बयानों के कारण चर्चा के केंद्र में रही हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उनके द्वारा गाए गए गाने 'मेरे दिल में है काबा और आंखों में मदीना' को लेकर काफी विवाद हुआ था, जिस पर बीजेपी ने ममता सरकार पर तुष्टीकरण के गंभीर आरोप लगाए थे। इसके अलावा उन्होंने आम आदमी पार्टी छोड़ भाजपा में गए राघव चड्ढा पर निशाना साधते हुए एक जनसभा में कहा था, "मैं चड्ढा नहीं हूं जो 'चड्डी' बन जाऊंगी, घोष हमेशा घोष ही रहेगा।" साल 2023 में टीएमसी यूथ विंग की अध्यक्ष रहने के दौरान कथित शिक्षक भर्ती घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उनसे 10 घंटे तक कड़ी पूछताछ भी की थी। सूत्रों के मुताबिक, सायानी घोष के इस विद्रोह की मुख्य वजह यह है कि जब वे इन तमाम विवादों के कारण विपक्ष और जांच एजेंसियों के सीधे निशाने पर थीं, तब टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व ने उनका खुलकर साथ नहीं दिया। विपरीत परिस्थितियों में खुद को अकेला पाकर और पार्टी द्वारा चुनाव प्रचार समय से पहले समाप्त करने के निर्देश दिए जाने से नाराज होकर उन्होंने अंततः ममता बनर्जी का साथ छोड़ने का फैसला कर लिया। ममता बनर्जी के सामने वजूद बचाने की अग्निपरीक्षा पश्चिम बंगाल की सियासत में पिछले डेढ़ दशक से एकछत्र राज कर रही तृणमूल कांग्रेस आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। एक तरफ जहां टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी और कीर्ति आजाद बागी नेताओं पर बीजेपी से मिलीभगत करने और गद्दारी करने के आरोप लगा रहे हैं, वहीं बागी नेता ममता बनर्जी पर पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक आवाज को पूरी तरह दबाने का आरोप लगा रहे हैं। 58 विधायकों और 20 लोकसभा सांसदों की इस सामूहिक बगावत ने न केवल पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार को हिलाकर रख दिया है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर बने विपक्षी गठबंधन 'इंडिया ब्लॉक' की रणनीतियों को भी मटियामेट कर दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने अब अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा है, जहां उन्हें अपनी बिखरती हुई पार्टी को संभालना है, जबकि दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और एनडीए इस महा-विखराव को बंगाल की धरती पर पूर्ण परिवर्तन के एक स्वर्णिम और ऐतिहासिक मौके के रूप में देख रहे हैं। नोट: यूनिक समय को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। यह भी पढ़े: Argentina Vs Iceland: Lionel Messi ने दागा ऐतिहासिक गोल, वर्ल्ड कप से पहले अर्जेंटीना ने आइसलैंड को 3-0 से रौंदा ताजा खबरों के लिए आप हमारे WhatsApp Channel को जरूर सब्सक्राइब करें। [web_stories title="true" excerpt="false" author="false" date="false" archive_link="true" archive_link_label="" circle_size="150" sharp_corners="false" image_alignment="left" number_of_columns="1" number_of_stories="8" order="DESC" orderby="post_date" view="carousel" /]