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Bharat Band: आज नए लेबर कोड और किसान नीतियों के खिलाफ भारत बंद; सड़कों पर उतरे 100 से अधिक संगठन

by Tarun Bhardwaj • February 12, 2026
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यूनिक समय, नई दिल्ली। केंद्र सरकार की आर्थिक और श्रम नीतियों के खिलाफ आज 12 फरवरी 2026 को पूरे देश में भारी जनाक्रोश देखने को मिल रहा है। 10 बड़ी ट्रेड यूनियनों द्वारा बुलाए गए इस ‘भारत बंद’ और राष्ट्रव्यापी हड़ताल को किसान संगठनों, छात्र संघों और कई जन संगठनों का व्यापक समर्थन मिला है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार की नीतियां ‘मजदूर और किसान विरोधी’ हैं और कॉर्पोरेट घरानों को फायदा पहुँचाने के लिए तैयार की गई हैं।

विवाद की जड़

केंद्र सरकार द्वारा 21 नवंबर 2025 से लागू किए गए चार नए लेबर कोड इस व्यापक हड़ताल और विवाद की मुख्य जड़ बने हुए हैं, जिसमें वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़े नियमों को शामिल किया गया है। हालांकि सरकार का यह तर्क है कि पुराने 29 श्रम कानूनों को इन चार संहिताओं में समाहित करने से लगभग 40 करोड़ मजदूरों और कर्मचारियों को सीधा लाभ पहुँचेगा, लेकिन ट्रेड यूनियनों का मानना है कि इस बदलाव से मजदूरों के बुनियादी अधिकार कमजोर हो गए हैं।

प्रदर्शनकारी संगठनों ने विशेष रूप से 8 घंटे काम की कानूनी गारंटी के प्रभावित होने और यूनियन बनाने की प्रक्रिया के कठिन होने पर गहरी चिंता व्यक्त की है, साथ ही उनका यह भी आरोप है कि पीएफ, ईएसआई और ग्रेच्युटी जैसे महत्वपूर्ण लाभ अब पूरी तरह से बड़े उद्योगपतियों की मर्जी पर निर्भर हो सकते हैं।

लेबर कोड के अलावा बिजली विधेयक 2025 और बीज विधेयक 2025 को लेकर भी देश के विभिन्न हिस्सों में कड़ा विरोध देखा जा रहा है, क्योंकि प्रदर्शनकारी इन्हें निजीकरण को बढ़ावा देने वाला और आम जनता व किसानों के हितों के खिलाफ उठाया गया कदम मान रहे हैं।

राज्यों में ‘भारत बंद’ का असर

राष्ट्रव्यापी हड़ताल का व्यापक असर उत्तर से लेकर दक्षिण भारत के कई राज्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहाँ छत्तीसगढ़ के औद्योगिक केंद्र भिलाई में सुबह पाँच बजे से ही मजदूर सड़कों पर उतर आए और एसीसी सीमेंट जैसी बड़ी इकाइयों में कामकाज पूरी तरह ठप रहा। इसी राज्य के रायगढ़ जिले के छाल क्षेत्र में कोल इंडिया की खदानों में कामकाज बंद रहने से उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ा है, वहीं प्रदर्शन में शामिल महिलाओं ने 12 घंटे की लंबी शिफ्ट और अपनी सुरक्षा को लेकर सरकार के सामने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

बिहार की राजधानी पटना में भी स्थिति कुछ ऐसी ही रही जहाँ सफाई कर्मियों और बैंक कर्मचारियों ने संयुक्त मोर्चा संभाला और डाकबंगला चौराहे पर जोरदार नारेबाजी की, जबकि पीएनबी और केनरा बैंक समेत 11 प्रमुख बैंकों के कर्मचारियों के हड़ताल पर रहने से बैंकिंग सेवाएं पूरी तरह चरमरा गईं।

मध्य प्रदेश के भोपाल में डाक भवन के सामने केंद्रीय कर्मचारियों ने विशाल रैली निकाली जिसका असर बीमा, बीएसएनएल और डाक विभाग के कामकाज पर स्पष्ट रूप से देखा गया।

पंजाब में भी इस बंद को आम आदमी पार्टी का समर्थन मिलने से आंदोलन को मजबूती मिली और मोगा में पनबस व पीआरटीसी के कर्मचारियों ने बसें रोककर गेट रैली के माध्यम से केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ कड़ा विरोध प्रदर्शन किया।

संगठनों की प्रमुख मांगें

प्रदर्शनकारी संगठनों ने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार के समक्ष मांगों की एक विस्तृत सूची प्रस्तुत की है, जिसमें सबसे प्रमुख मांग चारों श्रम संहिताओं यानी लेबर कोड्स को तत्काल प्रभाव से रद्द करना है। इसके साथ ही कर्मचारी संगठन लंबे समय से लंबित पुरानी पेंशन योजना (OPS) को फिर से बहाल करने और बिजली संशोधन विधेयक के साथ-साथ ड्राफ्ट सीड बिल को वापस लेने पर जोर दे रहे हैं। आंदोलनकारियों की मांगों में मनरेगा की पूर्ण बहाली और हाल ही में शुरू किए गए ‘विकसित भारत-रोजगार मिशन 2025’ को निरस्त करने का मुद्दा भी प्रमुखता से शामिल है। इसके अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा से संबंधित ‘SHANTI Act’ को भी पूरी तरह खत्म करने की मांग की जा रही है ताकि श्रमिकों और आम नागरिकों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।

कई जगहों पर परिवहन और आवश्यक सेवाओं को छोड़कर आम जनजीवन प्रभावित हुआ है। ट्रेड यूनियनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर विचार नहीं किया गया, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप ले सकता है।

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