Fri, Jun 5th, 2026
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भारत ने अमेरिका और चीन की ‘क्रेडिट पॉलिटिक्स’ को किया खारिज; “भारत-पाक सीजफायर में नहीं थी किसी की मध्यस्थता”

by Tarun Bhardwaj • December 31, 2025
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यूनिक समय, नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच हुए हालिया सीजफायर को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर श्रेय लेने की होड़ मच गई है। पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अब चीन द्वारा मध्यस्थता के दावों पर भारत ने सख्त रुख अपनाते हुए दोनों को आईना दिखाया है। भारतीय सरकारी सूत्रों और विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि यह पूरी तरह से दो देशों के बीच का द्विपक्षीय मामला था और इसमें किसी भी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं रही।

चीन के दावे पर भारत का करारा जवाब

बीजिंग में एक संगोष्ठी के दौरान चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने दावा किया कि चीन ने म्यांमार, फिलिस्तीन और ईरान के साथ-साथ भारत-पाकिस्तान तनाव को सुलझाने में भी मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। नई दिल्ली ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि चीन का बयान सच्चाई से कोसों दूर है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पाकिस्तान की कमर टूट गई थी, जिसके बाद पाकिस्तान ने खुद भारत से युद्धविराम की गुहार लगाई थी।

“किसी तीसरे पक्ष के लिए कोई गुंजाइश नहीं”

NDTV से बातचीत में सरकारी सूत्रों ने भारत के पारंपरिक रुख को दोहराया। भारत का कहना है कि पाकिस्तान के सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMO) ने खुद भारतीय DGMO से संपर्क कर सीजफायर का अनुरोध किया था। संघर्षविराम की तारीख, समय और शर्तें केवल दोनों देशों की सेनाओं के बीच तय हुई थीं। चीन से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने भी शांति का श्रेय लेने की कोशिश की थी, जिसे भारत ने पहले ही नकार दिया था।

चीन की ‘मध्यस्थता’ की लंबी सूची

चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने वैश्विक स्तर पर चीन को एक ‘शांतिदूत’ के रूप में पेश करने के लिए कई मुद्दों पर अपनी भूमिका का दावा किया जैसे ईरान परमाणु मुद्दा और फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष, म्यांमार और कंबोडिया-थाईलैंड सीमा विवाद, भारत-पाकिस्तान संघर्ष (जिसे भारत ने काल्पनिक करार दिया है)।

विदेश मंत्रालय का आधिकारिक रुख

मई 2025 में ही विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया था कि भारत की कूटनीति आत्मनिर्भर है। मंत्रालय के अनुसार, भारत-पाक संबंधों में शिमला समझौते और लाहौर घोषणापत्र के तहत किसी भी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता ने पाकिस्तान को वार्ता की मेज पर आने के लिए मजबूर किया, न कि किसी बाहरी दबाव ने।

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